Tuesday, December 6, 2011

Remembering No War Zone "AYODHYA"

वह मस्जिद है किस काम की?

है इतिहास गवाह अयोध्या जन्म-भूमि है राम की.
कौम बावरी हो जाये वह मस्जिद है किस काम की?

यहाँ न कोई हुआ युद्ध इसलिए अयोध्या नाम है.
बाबर ने मस्जिद बनवाकर किया इसे बदनाम है.
जिसमें है इतिहास दफ़्न वह जगह भला किस काम की?
उसे हटा देने में कुछ तौहीन नहीं इस्लाम की.

पढना तुम इतिहास बाद में पहले पढो कुरान को,
फ़र्क नहीं है पहचानो गर खुदा और भगवान को.
नेक काम जो करे जहाँ में कहलाता इंसान है.
जो खुद का एहसास कराये "खुद-आ" या कि भगवान है.

कौन नहीं जानता राम को खुद इतिहास गवाह है.
जिसने दुनिया को दिखलायी मर्यादा की  राह है.
उसका मन्दिर बने यहाँ पर मर्जी यही अवाम की.
कौम बावरी हो जाये वह मस्जिद है किस काम की?

बाबर क्या था हमलावर था जिसने कई गुनाह किये.
एक नहीं,  दो नहीं, सैकड़ों- लाखों लोग तबाह किये.
झण्डा फहराया जुल्मों का हक़ छीने इंसान के.
उसको आप बरावर तौलें बदले में भगवान के.

ऐसा कभी नहीं होगा जीते जी हिन्दुस्तान में.
बहुत बड़ा है फर्क़ यहाँ पर बाबर औ' भगवान में.

ठेकेदारों को बतला दो रहम करें इस्लाम पर.
खामोखाँ को बहस न छेड़ें मर्यादामय राम पर.
हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-इसाई रैयत हैं सब राम की.
मन्दिर-मस्जिद-गुरुद्वारा तो सीढी हैं बस नाम की.

खुद हैं सब फिरकापरस्त क्यों बी0जे0पी0 बदनाम है?
गान्धी की समाधि पर किसने लिखवाया "हे राम" है?
या तो गान्धी की समाधि से नाम हटा दो "राम" का.
या फिर से मन्दिर बनवा दो उसी जगह श्रीराम का.

बाबर था बावरा मगर ये बाबर के भी बाप हैं.
मस्जिद के ढाँचे को लेकर करते व्यर्थ प्रलाप हैं.
ये सेकुलरवाद  पर  सच में  एक बदनुमाँ दाग हैं.
किसी फूस के छप्पर पर ये रखी हुई इक आग हैं.

इन्हें हटा दो या दिखला  दो सच्चाई का रास्ता.
राम हमारे महापुरुष हैं बाबर से क्या वास्ता?
उनका मन्दिर बनने में ही इज्जत है इस्लाम की.
कौम बावरी हो जाये वह मस्जिद है किस काम की?


शब्दार्थ: बावरी=पागल, बावरा=सनकी

3 comments:

  1. बिल्कुल सही लिखा है, सहमत हूँ आपसे

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  2. ईट से ईट बजा दी ........ वाली कविता भी साथ पढ़कर मज़ा आ जाता हैं

    ईट से ईट बजा दी ये सुना था हमनें

    आज वह काम अयोध्या में हुआ दिखता हैं |

    यह समंदर हैं जो अपनी पे उतर आये तो

    सारी दुनिया को ये औकात बता सकता हैं |



    आज खतरा नही हमको हैं मुसलमानों से

    घर में जयचंद की औलादें बहुत ज्यादा हैं |

    मेरा कहना हैं कि उन सबसे निपटो लों पहले

    कौम को अपनी मिटाने को ये अमादा हैं |



    हम तो लोहू की स्याही से ये सब लिखते हैं

    ताकि सोया ये लहू जागे कसम खाने को |

    हम किसी जन्म में थे चंद,कभी थे बिस्मिल
    देखें कौन आता हैं यह फर्ज बजा लाने को

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    1. नृपेन्द्र! यह नज़्म मैंने अटलजी को लिखकर भेजी थी। जिसका उत्तर उन्होंने मुझे दिया था - "क्रान्त जी! आपकी नज़्म बहुत जोशपूर्ण है।"

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