Wednesday, January 23, 2013

Raj Nath Singh-New BJP Chief


राजनीति की नाथ (नकेल)
                                                           राजनाथ सिंह
                                             
                                               राजनीति में बढ़ रहे, आये दिन अब पाप;
                                               राजनाथ जी! सिंह बन, इसे सम्भालें आप!

                                               नितिन गडकरी ने लिया, निर्णय यकदम ठीक;
                                               सही समय पर छोड़ दी, बी०जे०पी० की  लीक!
       
                                               लीक-लीक गाड़ी चले, लीकहि चले कपूत;
                                               लीक छोड़ तीनों चलें, शायर-सिंह-सपूत!!

                                               अब तक जो भी लोग हैं, सत्ता-मद में चूर;
                                               उन्हें ठिकाने लाइये, समय नहीं है दूर!!
                                       
                                               नमो! नमो! का मन्त्र ही, कर सकता यह काम;
                                               यही आप अपनाइये,  भली करेंगे राम!!

                                               काँग्रेस में 'एक' है, लेकिन यहाँ 'अनेक';
                                               इन्हें लीक पर लाइये, आगे हो बस 'एक'.

                                               कहें 'क्रान्त' तब बनेगी, सन चौदह में बात;
                                               गर ये आपस में लड़े, मलते रहना 'हाथ'!!
                     
                                        नोट: ऊपर दी हुई फोटो http://www.livemint.com/ के सौजन्य से 

Friday, January 11, 2013

No mother will give birth to a poet?

वरना कोई माँ कवि को जन्म नहीं देगी?

कवि के आँसू बरसात अगर बन जाते तो बदली में छुपकर चाँद न सावन में रोता,
भावुकता का प्रतिकार अगर जग दे पाता तो कवि जैसा कोई भी हृदय नहीं होता.

दोपहरी अगर शरीर नहीं झुलसाती तो सुख की चाँदनी थपकियाँ देने क्यों आती?
अस्तित्व बुढ़ापे का जग से मिट जाता तो मासूम जबानी आज किसी को क्यों भाती?

गोदी में पले हुए बचपन की याद करो जो होता है निर्दोष जिसे कुछ चाह नहीं,
वह भोलापन जब आँखों में बस जाता है फिर रहती है मुझको जग की परवाह नहीं.

पर हाय! जगत के कीचड़ तुझमें फँसते ही "मेरा-तेरा" बनकर फितूर छा जाता है,
फिर हो जाता है भोलेपन का सर्वनाश हर ओर द्वेष से पूर्ण विश्व दिखलाता है.

दुनिया में थोड़ी उम्र जिसे मिल जाती है वह सारे जग का शहंशाह बन जाता है,
फिर नहीं समझता है वह यह जग मेरा है या मेरा भी कुछ जग वालों से नाता है.

वाणी के मूक पुजारी धारा में बहकर कुछ लिखने को आते पर कुछ लिख जाते हैं,
उनमें सौन्दर्य-व्यथा अक्सर लग जाती है इसलिये महाकवि बनने से रह जाते हैं.

वैसे तो इस दैवी-प्रदत्त प्रतिभा का कुछ विरले ही जग में सदुपयोग कर पाते हैं,
वरदान उन्ही को सरस्वती माँ देती है जिससे वे अपना नाम अमर कर जाते हैं.

जब होने लगता मानवता का सर्वनाश जब पशुता अपना ताण्डव नृत्य दिखाती है,
तब मधुर लेखनी बन जाती विषधर कटार वाणी माँ सरस्वती काली बन जाती है.

जब दरिद्रता पर होने लगता अनाचार निर्दोष त्रस्त हो हाहाकार मचाते हैं,
तब छोड़ प्रिया की कमल-सेज भावना-पूत जो कवि होते हैं विद्रोही बन जाते हैं.

मंजिल पर जाकर किसको गौरव नहीं मिला सच पर बलि देकर किसने सुयश नहीं पाया,
जिसको न मृत्यु ने अपना ग्रास बनाया हो धरती पर अब तक ऐसा मनुज नहीं आया.

जब मानव को मानव से प्रेम नहीं होगा तो मानवता कैसे जिन्दा रह पायेगी?
जिसकी भावुकता की जग हँसी उड़ाएगा निश्चय उसकी भावना क्रान्त हो जायेगी.

निर्ममता ईर्ष्या अहंकार से दबे हुए मालूम नहीं इस प्राणि मात्र का क्या होगा?
पर यह सच है जिसने जैसा भी किया कर्म परिणाम उसी अनुरूप सदा उसने भोगा.

मैं पुन: कह रहा हूँ कवि के उद्गारों को दिल से समझो फिर उस पर सोच विचार करो,
वरना कोई माँ कवि को जन्म नहीं देगी इसलिये सदा ही कवि का तुम सम्मान करो.

Monday, January 7, 2013

Give me some rights & then see

विश्व दे अधिकार....

विश्व दे अधिकार यदि कवि के मनुज को,
तोड़ दे जंजीर क्या? वह व्यूह शत-शत

दर्प मानव को परे ले जा रहा है,
स्वार्थ से संसार भरता जा रहा है;
आज वैज्ञानिक खिलौना बन गया है,
हो रहा जड़वाद के हाथों हताहत.

विश्व दे अधिकार यदि कवि के मनुज को,
तोड़ दे जंजीर क्या? वह व्यूह शत-शत

वन्य होती जा रही शिक्षित मनुजता,
मुक्त प्राणों में भरी है एक पशुता;
आज जीवन खुद समर्पित हो गया है,
बीतता जाता युगों के साथ सम्वत.

विश्व दे अधिकार यदि कवि के मनुज को,
तोड़ दे जंजीर क्या? वह व्यूह शत-शत

सत्य से सब बिमुख होते जा रहे हैं,
मात्र हिंसा को सभी अपना रहे हैं;
एक हम में क्या? सकल मानव जगत में,
बढ़ रहा वैषम्य प्रतिभा हो रही क्षत.

विश्व दे अधिकार यदि कवि के मनुज को,
तोड़ दे जंजीर क्या? वह व्यूह शत-शत

भोग में आसक्ति बढ़ती जा रही है,
रोग से जन-शक्ति घटती जा रही है;
प्रेत हैं, मानव जिन्हें तुम कह रहे हो,
हैं विकृत मुख, कर्म हैं इनके असंस्कृत.

विश्व दे अधिकार यदि कवि के मनुज को,
तोड़ दे जंजीर क्या? वह व्यूह शत-शत

आज भौतिक रूप मिटता जा रहा है,
बली से कमजोर पिटता जा रहा है;
और महिमाधर जिन्हें तुम कह रहे हो,
मन्दस्मित मुख बना होते न लज्जित.

विश्व दे अधिकार यदि कवि के मनुज को,
तोड़ दे जंजीर क्या? वह व्यूह शत-शत

आज कवि के हाथ में अधिकार दे दो,
ठीक करने को विकृत आचार दे दो;
दिव्य भावों के प्रहारण से बदल दे,
आज का अणुयुग निदाघों से पराश्रित.

विश्व दे अधिकार यदि कवि के मनुज को,
तोड़ दे जंजीर क्या? वह व्यूह शत-शत

नोट:- यह कविता मेरी कृति 'क्रान्तिकी' से ली गयी है. सन १९६५ में लिखी गयी यह कविता क्या आज के हालात पर सटीक नहीं बैठती? पर किया क्या जाये. जिनके पास अधिकार हैं वे कुछ करना नहीं चाहते और जो कुछ करना चाहते हैं उन्हें इस पूँजीवादी व्यवस्था के चलते अधिकार नहीं मिल पाते. यही तो सारा गड़बड़ है.

Monday, December 31, 2012

Pitcher of sins

पाप का घड़ा


मित्रो! मैंने कभी "वंशवाद का वैताल" शीर्षक से एक कविता लिखी थी:

सैंतालिस में माटी हो गई कांग्रेस की काया,
उस माटी में वंशवाद का महाप्रेत घुस आया;
नेहरू-इन्द्रा के पीछे राजीव-सोनिया आये,
राहुल बाबा सोच रहे- "कब उनका नम्बर आये?"
कहें 'क्रान्त' जब राहुल बाबा का नम्बर आयेगा,
कांग्रेस के पापों का तब घड़ा फूट जायेगा.

२०१२ के जाते-जाते दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की जो ह्रदय विदारक घटना हुई
उसके कुछ पहलू विचारणीय हैं. मैं इस ब्लॉग के माध्यम से समूचे देश का ध्यान
उन पर ले जाना चाहता हूँ.

देश की राजधानी दिल्ली में सरकार की नाक के नीचे एक महिला के साथ जो कुछ
हुआ उसमें दिल्ली की मुख्यमन्त्री शीला दीक्षित से लेकर कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गान्धी,
नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज तीनों की राशि "कुम्भ" है. सिंगापुर, जहाँ पहुँचकर उस युवती
महिला ने दम तोड़ा उसकी राशि भी "कुम्भ" है.  कुम्भ घड़े को कहते हैं यह इस बात का
संकेत है कि कांग्रेस सरकार के पापों का घड़ा (कुम्भ) लगभग भर चुका है और यह
राहुल बाबा के आते ही फूटने वाला है.

मेरी डॉ. मनमोहन सिंह जी से प्रार्थना है कि वे स्वेच्छा से २०१३ में राहुल गान्धी को गद्दी
सौंप दें ताकि कांग्रेस के पापों का घड़ा वही अपने सिर पर रखकर अपने पूर्वजों की चिता
की परिक्रमा करते हुए राजघाट के आसपास जाकर फोड़ सकें.

प्रतीक्षा कीजिये अंग्रेजी नववर्ष (२०१३) के शुभागमन की.....
  

Tuesday, December 25, 2012

Atal Bihari Vajpayee's Meri Ikyavan Kavitayen:Rhym-Review

Atalji speaking on 19-12-1996

अटलबिहारी वाजपेयी की काव्य-कृति

मेरी इक्यावन कविताएँ

की

काव्य-मीमांसा

समीक्षा गीत

डॉ. मदनलाल वर्मा 'क्रान्त'

१३ अक्टूबर १९९५ को नई दिल्ली के फिक्की सभागार में उपरोक्त कृति का विमोचन तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव ने किया था. इस कृति की काव्य-मीमांसा मैंने एक समीक्षा गीत के रूप में अपनी ही हस्तलिपि में लिखकर अटलजी को उनके निवास स्थान पर जाकर भेंट की थी. बाद में यह सुनील जोगी ने इसे अपनी पुस्तक राजनीति के शिखर: कवि अटलबिहारी वाजपेयी में प्रकाशित भी किया था. आज अटलजी के ८८ वें जन्म-दिन पर मैं इस समीक्षा गीत को यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ. इसमें उक्त कृति की कविताओं के "शीर्षकों" का प्रयोग करते हुए काव्य-मीमांसा करने की कोशिश की गयी है. समीक्षा गीत काव्यशास्त्र की सर्वाधिक नई विधा है जिसका हिन्दी जगत को स्वागत करना चाहिये.

काव्यपरक अनुभूति स्वरों में शामिल हैं तेइस कविताएँ,
कविता में संकल्प बोलता-"आओ! फिर से दिया जलाएँ."
"हरी दूब" पर "अवसर" जैसे हो पहचान निजत्व बोध की,
"गीत नहीं गाता हूँ" में वैराग्य-भावना स्वत्व-शोध की.

है तटस्थ अभिव्यक्ति व्यक्ति की "ना मैं चुप हूँ ना गाता हूँ,"
फिर भी कवि प्रयासरत हो कहता है-"गीत नया गाता हूँ."
है व्यक्तित्व परक दर्शन की शब्दमयी अभिव्यक्ति "ऊंचाई",
"कौरव कौन? कौन पाण्डव?" है राजनीति की यह सच्चाई.

जब "दरार पड़ गयी दूध में" फिर "अलगाव" कहाँ से जाये?
है "मन का सन्तोष" मनुजता पर ये मन कैसे समझाये?
नाम आपका "अटल" "झुक नहीं सकते" यह है अटल-प्रतिज्ञा,
"दूर कहीं रोता है कोई" लिये अकेलेपन की त्रिज्या.

"जीवन बीत गया" यह कोई चक्र नहीं यूँ ही रुक जाये,
जीवन है संघर्ष तभी "ठन गयी मौत से" यह बतलाये.
"राह कौन सी जाऊँ मैं" में यह कैसा भ्रम पाल लिया है?
यह तो एक महानगरी है फिर क्यों सोच-विचार किया है?

"हिरोशिमा की पीड़ा" में है शिव के महाप्रलय की क्रीड़ा,
"नये मील का पत्थर" कहता-पुन: उठाओ व्रत का बीड़ा.
न हो निराशा कभी "मोड़ पर","मनस्विता की गाँठें" खोलें;
"नई गाँठ लगती है" फिर भी यह चादर कबीर सी धो लें.

चक्रव्यूह में चक्षु न भटकें "यक्ष-प्रश्न" के समाधान हों,
निर्मलतामय "क्षमा-याचना" पूर्ण सभी स्वर मूर्तिमान हों.
"राष्ट्रीयता के स्वर" में हैं दसो दिशाओं की कविताएँ,
"स्वतन्त्रता ही की पुकार" है भारत माँ की अभिलाषाएँ.

"अमर आग है" प्रखर तत्व की "परिचय" में हिन्दू-निष्ठा है,
स्वाभिमान गौरव जतलाने "आज सिन्धु में ज्वार उठा है".
"जम्मू की पुकार" के पीछे कहता काश्मीर - हे ईश्वर!
ना जाने किस रोज बढ़ेंगे? "कोटि चरण इस ओर निरन्तर".

मगन "गगन में कब लहरेगा भगवा ध्वज?" यह पुन: हमारा,
"उनको याद करें" जिन सरफ़रोश वीरों ने हमें उबारा.
है गणतन्त्र अमर "सत्ता" के मद में चूर न हम हो जायें,
राष्ट्रीयता के स्वर में सन्देश दे रहीं दस कविताएँ.

देश भक्त जेलों में ठूँसे हुई "मातृपूजा प्रतिबन्धित",
"कण्ठ-कण्ठ में एक राग है" यह स्वर हुआ राष्ट्र में गुंजित.
अटल चुनौती ने ललकारा-"आये जिस-जिस में हिम्मत हो",
"एक बरस जब बीत गया" तो लगा कि जैसे सत्यागत हो.

जब "जीवन की साँझ ढली" तो लगा कि जैसे डगर कट गयी,
लौटी आश "पुन: चमकेगा दिनकर" काली-निशा छँट गयी.
"कदम मिलाकर चलना होगा" पुन: पड़ोसी से कहते हैं,
होते हैं समृद्ध वही जो मिलकर एक साथ रहते हैं.

अटल चुनौती के स्वर हैं ये सब की सभी आठ कविताएँ,
आओ! इनका दर्शन समझें अपने जीवन में अपनाएँ.
अपनों के सपनों का रोना "रोते-रोते रात सो गयी",
प्रकृति-पुरुष को पास "बुलाती तुम्हें मनाली" बात हो गयी.

मन का "अन्तर्द्वंद्व" न सुलझा ग्रन्थि सवालों की सुलझा ली,
"बबली-लौली" स्नेह-वर्तिका से मनती हर साल दिवाली.
"अपने ही मन से कुछ बोलें" जीवन का हर द्वार खुलेगा,
पिया! "मनाली मत जइयो" अन्धे-युग का धृतराष्ट्र मिलेगा.

"देखो! हम बढ़ते ही जाते" चरैवेति अपना चिन्तन है,
"जंग न होने देंगे" यह हम हिन्दू लोगों का दर्शन है.
जो हिंसा से दूर रहे वह सच्चे अर्थों में हिंदू है,
जो इस् ला को त माने उस मजहब की रग-रग में बू है.

"आओ! मर्दो नामर्द बनो" व्यंग्योक्ति शक्ति का नारा है,
यह "सपना टूट गया" तो फिर कलयुग में संघ सहारा है.
तेइस दस आठ और दस मिलकर हैं इक्यावन कविताएँ,
जीवन-दर्शन की द्योतक हैं- मेरी इक्यावन कविताएँ.

"मेरी इक्यावन कविताएँ" हैं अटलबिहारी का जीवन,
सच है "मनुष्य के भी ऊपर होता है उसका अपना मन".
तुम अपने मन के राजा हो मन का धन कहीं न खो जाये,
कितने ही ऊँचे उठो मगर अभिमान न रत्ती भर आये.

अपनेपन की सौगन्ध आपको 'क्रान्त' दे रहा बार-बार,
श्रद्धेय अटलजी! जीवन भर बस यूँ ही रहना निर्विकार.
  
 नोट:- अपनी प्रतिक्रिया अवश्य भेजें, हमें आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी. इसमें ऊपर जो चित्र दिया है वह अटल जी का उस समय का ऐतिहासिक चित्र है जब वे रामप्रसाद 'बिस्मिल' की पुण्य-तिथि पर नई दिल्ली में आयोजित पुस्तक-विमोचन समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे. पृष्ठभूमि में लगा हुआ क्रान्तिकारी पण्डित रामप्रसाद 'बिस्मिल' का चित्र कार्यक्रम के पश्चात् भारतीय जनता पार्टी के केन्द्रीय कार्यालय में लगवा दिया गया था. उस समय नरेन्द्र मोदी जी केन्द्रीय कार्यालय में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में नियुक्त थे.



Poet Shyam Nirmam is no more!

श्याम निर्मम (1950-2012) की स्मृति में

उनकी कृति हाशिये पर हम के समर्थन में लिखा गया

समीक्षा गीत 

(आज मन बहुत उदास है मेरे प्रिय मित्र श्याम निर्मम आज नहीं रहे अब केवल उनकी कीर्ति ही शेष रह गयी है. कभी उन्होंने मुझे अपनी कृति "हाशिये पर हम" भेंट की थी. मैंने उस पर एक "समीक्षा गीत" लिखकर उन्हें भेजा था. पता नहीं उन्होंने उसका कहीं उल्लेख या उपयोग किया अथवा नहीं बहरहाल उस समीक्षा गीत को यहाँ इस ब्लॉग पर पोस्ट कर रहा हूँ. )

निर्मम क्यों हो? प्रश्न किया जब माँ की ममता ने,
उत्तर दिया पिता की बूढ़ी होती क्षमता ने;
मैं माटी का गीत लिये जब लहरों पर उतरा,
नौका एक काँपती है सामने खड़ा खतरा.
हुआ सत्य-शिव-सुन्दर फिर भी अंतहीन यात्रा,
उम्र हुई खरगोश बढ़ गयी जीवन की मात्रा.

ये विराट बौने आहत तुम साँकल कभी हुए,
शंख आत्मबल का टूटा भ्रम बादल सभी हुए;
चील मछलियों पर डेरा डाले मँडराती है,
फूल कोई अधखिला उसे यह हवा डराती है;
सब हो गया हवन जीवन कितना सन्नाटा है!
चित्र बिगड़ते बनते उन्हें धार ने काटा है.

अरे बोल रे मन! क्यों हुईं मदनगंधा साँसें,
सदा रौशनी उसको मिलती जो देता झाँसे;
हमीं वंशधर हैं सूरज के जो दिन-रात जले,
हैं वीरान बस्तियाँ मन की, बंजारे निकले;
ये सलाइयाँ सुरमे की कह रहीं उदासी गा!
ज्योति-पन्थ दिखला सबको तू खुद मशाल बन जा.

सूखी घास रौंदते घोड़े, ये ही दिव्य हुए;
थर्राता है गगन, धुँआ होकर हम हव्य हुए;
क्यों सपनों का अहं छले, बेखबर हुआ निर्झर;
अभी मौन है बंशी, मैं कड़वा काढ़ा तू ज्वर.
ऐहसासों की नमी हुई गुम ऐसा घाव हुआ,
सफ़र जिन्दगी का जैसे कोई भटकाव हुआ.

रोज सवेरा उगता है इठलाता है यौवन,
हमें साँप सा डसता है घनघोर अकेलापन;
टूटेंगे सब जाल कुहासी जो तूने डाले,
कंठ सभी भर्राये जब टूटे तम के जाले.
गुलमोहर की छाँव भरे दिन हुए दिशाओं के,
पावन गंध हुई, नूपुर बज उठे हवाओं के .

खामोशियाँ बैंजनी मोती की, कवि-स्वर घायल;
वातायन के सेतु काँपते, गुमसुम है पायल; 
ऐसे में एहसास करीलों में कुछ तितली सा,
बौने हुए बड़े दम घुटता जल में मछली का;

अमृत सब चाहते यहाँ पर शंकर कौन बने?
शिखर ढह रहे छन्दों के गीतों की कौन सुने?
हम कविता के बीज हमारे शब्दों में है दम!
आज हाशिये पर हम तो क्या कल होंगे परचम!!










Wednesday, November 28, 2012

Lamps of Pain (English Translation of वेदना के दीप)

LAMPS OF PAIN

This is the English translation of  premier lyric of my book VEDNA KE DEEP which was published in my another book स्वप्न भ्रंश / DEAD DREAM in 1994 (2nd Edition) from KIMVA PRAKASHAN, NOIDA.

I lit the lamps of uncommon pain.

Morn of your notion had taken away,
The night of dreams towards a dawn.
Laughed my lips having eyes' perception,
That you would not now leave me alone.

But the cruel night launching an arrow,
Roused the agony of my sentiment.
Why did thou touch the sky? tell me,
Leaving my horizon and killing attachment.

Rest is the will to die, no lust,
I have quenched my every thrust.
Void is the oyster and pearls are drain,
I lit the lamps of uncommon pain.

So as to fulfill my accomplishment,
I did continued walking on the way.
But the hurdles always block my track,
And stop the outcoming feeling's ray.

Don't be perplexed of such hinderance,
You are not to get here any repose.
Flow as much as you can, O stream!
You are to get peace in last pose.

O beetle do'nt disclose my distress,
Otherwise there won't be any dawn.
Smearing with tears my every strain,
I lit the lamps of uncommon pain.

Tuesday, November 27, 2012

Vedna Ke Deep (हिन्दी)

वेदना के दीप

वर्ष २००१ में प्रकाशित यह कृति अखिल भारतीय स्तर पर गीत विधा की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक के रूप में चुनी गयी और इस पर २००२ में भवानीप्रसाद मिश्र सम्मान दिया गया.

इस पुस्तक के मुखपृष्ठ पर दिया गया फोटो मेरी धर्मपत्नी का है इस आवरण को मेरी पुत्री अल्पना आदित्य ने बनाया था जो आजकल इण्डिया टुडे ग्रुप में सीनियर डिजाइनर है.

मेरे ब्लॉग के पाठकों की सेवा में इस पुस्तक का आमुख गीत दे रहा हूँ.


मैं जलाता हूँ अनूठी वेदना के दीप

स्वप्न-रजनी को तुम्हारी कल्पना का भोर,
ले उड़ा था एक अद्भुत जागरण की ओर.
हँस पड़े थे ये अधर पाकर नयन-सन्देश,
तोड़कर अस्तित्व जाओगे न तुम परदेश.
पर निठुर नीली निशा ने छोड़कर वह तीर,
फिर बढ़ा दी आज मेरी भावना की पीर.
छोड़कर मेरा क्षितिज क्यों छू लिया आकाश,
धूल के कण में मिला दी एक टूटी आश.
रह गयी बस चाह मिटने की न कुछ अनुराग,
रश्मियों से भर चुका हूँ चाँदनी की माँग.
मोतियों से रिक्त होती जा रही यह सीप,
मैं जलाता हूँ अनूठी वेदना के दीप.

रह न जाये फिर कहीं मेरी अधूरी साध,
शिथिल पैरों को बढ़ाता जा रहा निर्वाध.
किन्तु फिर भी पन्थ पर आता सतत अटकाव,
रोक लेता जो व्यथा के नित्य परिचित भाव.
विघ्न से मत हो विकल तेरा यही परिणाम,
है न पल भर भी तुझे मिलना यहाँ विश्राम.
बह सको जितना बहो हे उर्मियों के नीर,
शान्ति मिलनी है तुम्हें बस एक तट के तीर.
अलि! न कह देना किसी से विवश मन की बात,
अन्यथा होगा न जीवन में सुनहला प्रात.
आँसुओं से आज देहरी-द्वार-आँगन लीप,
मैं जलाता हूँ अनूठी वेदना के दीप.

Tuesday, October 2, 2012

Lalita Ke Aansoo (English Translation of Hindi Epic)


Tears Of Lalita
(English translation of Lalita Ke Aansoo)

Originally this epic was published in 1978 in Hindi. I translated it into English and got it published in 1984 for the first time in India by Kimva Prakashan Moradabad.

Here I am posting the introductory chapter. Its original Hindi version was posted earlier on 11th of January 2012.

P.S. I am pleased to inform that this Epic "Lalita Ke Aansoo"was ranked 86th amongst Top 100 Epics Of The World.

TRIBUTE : DEDICATION

O sacred symbol of propriety! O celestial dwelling of humanity!
O peerless man of present History! Shastri! I salute your sovereignity!!

You saw tomorrow of motherland, and did not care for your life's today.
This were you, who never ignored; the call of human-heart anyway.

You saw the luster of shining stars, and not only looked at desolate sky.
You endured deep disaster of autumn, and did not entangle with spring's eye.

You always revered intellect, no doubt; and never venerated before any image.
You collided thoughout life for doctrines, and did not destest with religious phase.

You learned to walk on burning embers, with bare feet and smiling face.
You always learned to nourish properly, in every scarcity of life and race.

You called indigence a boon, not curse; and left no scope for any conscience.
You saw from within the cottage even, and not only looked at big mansions.

You incarnated on earth as scientist, to search the truth, faith and composure.
You never looked at external cover, but saught its internal shining lusture.

You not only got the delicate love, of Shrimati Lalita Shastri,your wife.
You also got the fondling of mother, Ram Dulari throughout your life.

You drove the chariot of statecraft, but could'nt succeed to get its goal.
You were of course done to death, and could'nt return your land with soul.

You did not die but became eternal, this firm belief I do have but.
The slogan "Jai Kisan" was left undone, now who is there to look after it?

You were the smiling rosy blossom, but blighted in the scorching sun.
You aimed the arrow right at target, but missed the game in the last run.

The way that was not left in battle, how it was abondoned in the peace!
The heart that was so solemnised, then say, how it was broken in twich!

This very question protrudes as doubt, in every mind and every heart.
But helpless history is still taciturn, it does not annotate somewhat.

The arduous problem that statesmen, could not solve in eighteen years.
Not even a single foe of India, could comlicate you due to fear.

This were you who solved that problem, within the eighteen months of rule.
The entire forces had fallen over enemy, what a fire you have fired in the fuel!

Within short period of your regime, the country roared in its full range.
Wherever you casted your distinct vision, blood of youths accepted the challange.

At the rending time of your departure, surface of earth was wet with tears.
Even the holy history was oozed, with the tributes sent from all spheres.

O Lal Bahadur! brave son of soil! on your all the time departures date.
This little book with agrrieved heart, to Shrimati Lalita, I dedicate.

11 January 1978 Vijay Ghat New Delhi India   *Krant M.L.Verma

Friday, September 28, 2012

Bhagat Singh in Nalgadha

जन्मदिन पर विशेष:

नलगढ़ा (नोएडा) में भगतसिंह

"सर देकर जो दार पर,
कहलाये सरदार.

मुँह तो उज्ज्वल कीजिये,
सरदारों का यार !" 



मित्रो! गत वर्ष मैंने इस ब्लॉग पर अमर शहीद पण्डित रामप्रसाद 'बिस्मिल' के भूमिगत जीवन के बारे में एक पोस्ट लिखी थी.

इस बार क्या अद्भुत संयोग है कि मुझे आज एक ऐसे पवित्र स्थान को देखने का सौभाग्य मिला जिसके बारे में केवल कुछ समाचार पत्रों में पढ़ा था प्रत्यक्ष देखा न था. पेश है उसकी एक संक्षिप्त रिपोर्ट:

सन १९१८ में "मैनपुरी काण्ड" करके बिस्मिल ने दिल्ली के समीप यमुना व हिन्डन नदी के मध्य स्थित बीहडों में शरण ली थी और यहाँ के एक छोटे से गाँव रामपुर जागीर के गूजरों के जानवर चराये थे उसके बाद वे यहाँ से कोसमा अपनी बहन के घर चले गये. इस बात को जब उन्होंने अपनी क्रान्तिकारी पार्टी के लोगों को बताया तो उन्हें यह स्थान छुपने के लिये सबसे ज्यादा सुरक्षित लगा.

आजकल जहाँ "नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे" बन चुका है उससे बिलकुल सटे एक छोटे से गाँव नलगढ़ा में ग्रेटर नोएडा आर्य समाज की ओर से सरदार भगतसिंह के जन्मदिन पर एक यज्ञ का आयोजन किया गया जिसमें उन्होंने वक्ता के रूप में मुझे भी आमन्त्रित किया था. कार्यक्रम के दौरान आर्यदीप पब्लिक स्कूल के स्वामी बिजेन्द्र आर्य जी ने जब यह बात बतायी कि 'क्रान्त' जी यही वह गाँव है जहाँ कभी पण्डित रामप्रसाद 'बिस्मिल', चन्द्रशेखर आज़ाद, सुखदेव, राजगुरु और भगतसिंह आदि अनेक क्रान्तिकारी छुपकर बरतानिया हुकूमत के दौरान अपनी योजनायें बनाया करते थे. केवल इतना ही नहीं, उन्होंने दिल्ली असेम्बली में जो बम फेंका था फेंकने से पूर्व उस जैसे अनेकों बम बनाकर उनका परीक्षण भी इसी जगह किया था. वह पत्थर जिस पर रखकर उस बम का परीक्षण किया था वह इस गाँव के कुछ सरदार लोगों ने आज भी सुरक्षित रखा हुआ है.

मेरी उत्सुकता यह बात सुनकर और भी अधिक बढ़ गयी तो वे लोग मुझे गुरूद्वारे में ले गये. मैंने पहले गुरूद्वारे जाकर पूरी श्रद्धा से पवित्र गुरु ग्रन्थ साहब को नमन किया फिर उस पत्थर को देखने की इच्छा प्रकट की.

मेरे साथ बीटावन  सेक्टर की आर.डब्लू.ए. के महामन्त्री हरीन्द्र भाटी अध्यक्ष देवेन्द्र टाइगर, आर्य समाज ग्रेटर नोएडा के रामेश्वर सरपंच, पूर्व न्यायाधीश जयप्रकाश नागर, देवमुनि जी, जनमेजय शास्त्री, धर्मवीर प्रधान व नलगढ़ा गाँव के सरदार सुखदेवसिंह, श्रीमती सुरजीत कौर,  जसपालसिंह, महेन्द्रपाल सिंह व अन्य कई लोग थे. मैंने उस पत्थर को बड़े ध्यान से देखा और उसके कई कोणों से फोटो लिये. उन फोटुओं को यहाँ इस ब्लॉग पर दे रहा हूँ.
बिजेन्द्र आर्य ऊँगली के इशारे से पत्थर के एक साइड में बने गड्ढे को दिखाते हुए.
परीक्षण के दौरान बम-विस्फोट से यह गड्ढा काला हो गया साफ़ दिखायी देता है.
इसी पत्थर की दूसरी साइड में बना हुआ लगभग उसी आकार का एक और गड्ढा.
पत्थर के ऊपरी सिरे पर बारूद बनाने का वह स्थान जिस पर शोरा, गन्धक व इमली का कोयला रखकर उसको चटनी की तरह पीसकर बारूद तैयार होता था.

पत्थर को देखते हुए कार्यक्रम में पहुँचे अन्य लोगों की तस्वीर भी ले ली  जिससे पत्थर की लम्बाई, चौड़ाई व मोटाई का सरसरी तौर पर अनुमान लगाया जा सके.

इस पत्थर को बड़ी बारीकी से देखने के बाद लगा कि यह तो पुरातत्व विभाग के लिये नितान्त शोध की वस्तु है. निस्संदेह यह पत्थर पोखरण के उस मैदान से भी अधिक महत्व का है जहाँ मिसाइलमैन ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और अटलबिहारी वाजपेयी जी की उपस्थिति में भारत ने कभी परमाणु परीक्षण करने का पहली बार साहस किया था. और अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी थी.

नलगढ़ा में जो गुरुद्वारा है उसकी चहारदीवारी से सटाकर सुरक्षित रखे गये इस पत्थर का ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व है. क्या केन्द्र अथवा राज्य सरकार इस स्थल को संरक्षण प्रदान करेगी या केवल सत्तारूढ़ नेताओं की छवि बनाने में ही जुटी रहेगी? फिर चाहे वह नेहरू-गान्धी परिवार हो, सुश्री मायावती हों या कोई और?

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टिप्पणी:  दार माने फाँसी का तख्ता