Saturday, August 13, 2011

A poet's message to P.M.

रक्षा-बन्धन पर विशेष सन्देश
राष्ट्र- रक्षा का संकल्प

नक़ल करें तो सत्य की, अपनायें तो धर्म.
प्रीति करें तो कर्म से, समझ सकें तो मर्म.

सात कोस चौबीस गज, दस फुट के दरम्यान.
बेगम हुक्म चला रहीं, बादशाह प्रेशान?

सात कोस चौबीस गज, दस फुट तीनों नाप.
चौरासी लख योनि का, काट फटाफट पाप.

दसवें गुरु के बाद अब, तू बन जा इतिहास.
बन्दा वैरागी तुझे दिखला रहा प्रकाश.
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संकेत: सात कोस=7  रेस कोर्स रोड (प्रधान मन्त्री निवास), चौबीस गज =24  अकबर रोड (कांग्रेस मुख्यालय), दस फुट= 10   जनपथ (कांग्रेस अध्यक्ष का निवास), प्रेशान=परेशान का पंजाबी उच्चारण

7  कोस=55440  फुट : 24  गज=72  फुट : 10  फुट=10 फुट. अनुपात=5544 :7.2 :1 
बादशाह=डॉ० मनमोहन सिंह, बेगम=सोनिया गान्धी,  हुक्म=कांग्रेस-अध्यक्ष
ताश के  पत्तों में बादशाह बेगम और हुक्म के पत्तों का क्या स्थान है इसे ध्यान में रखें.
 


Monday, August 8, 2011

Historical Kakori Conspiracy Case of 1925

ऐतिहासिक काकोरी काण्ड
( ९ अगस्त पर विशेष लेख ) 

जनवरी १९२३ में मोतीलाल नेहरू व देशबन्धु चितरंजन दास सरीखे धनाढ्य लोगों ने मिलकर स्वराज पार्टी बना ली। नवयुवकों ने तदर्थ पार्टी के रूप में 'रिवोल्यूशनरी पार्टी' का ऐलान कर दिया। सितम्बर १९२३ में दिल्ली के विशेष कांग्रेस अधिवेशन में असन्तुष्ट नवयुवकों ने यह निर्णय लिया कि वे भी अपनी पार्टी का नाम व संविधान आदि निश्चित कर राजनीति में दखल देना शुरू करेंगे अन्यथा देश में लोकतन्त्र के नाम पर लूटतन्त्र हावी हो जायेगा। देखा जाये तो उस समय उनकी यह बड़ी दूरदर्शी सोच थी। सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी लाला हरदयाल, जो उन दिनों विदेश में रहकर हिन्दुस्तान को स्वतन्त्र कराने की रणनीति बनाने में जुटे हुए थे, राम प्रसाद बिस्मिल के सम्पर्क में स्वामी सोमदेव के समय से ही थे। लाला जी ने ही पत्र लिखकर राम प्रसाद बिस्मिल को शचीन्द्र नाथ सान्याल व यदु गोपाल मुखर्जी से मिलकर नयी पार्टी का संविधान तैयार करने की सलाह दी थी।  लाला जी की सलाह मानकर राम प्रसाद इलाहाबाद गये और शचीन्द्र नाथ सान्याल के घर पर पार्टी का संविधान तैयार किया। इस बात का जिक्र सान्याल जी के छोटे भाई जितेन्द्र नाथ सान्याल ने अपनी पुस्तक अमर  शहीद सरदार भगतसिंह में किया है।

नवगठित पार्टी का नाम संक्षेप में एच० आर० ए० रक्खा गया व इसका संविधान पीले रँग के पर्चे पर टाइप करके सदस्यों को भेजा गया। ३ अक्तूबर १९२४ को इस पार्टी (हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन) की एक कार्यकारिणी-बैठक कानपुर में की गयी जिसमें शचीन्द्र नाथ सान्याल, योगेश चन्द्र चटर्जी व राम प्रसाद बिस्मिल आदि कई प्रमुख सदस्य शामिल हुए। इस बैठक में पार्टी का नेतृत्व बिस्मिल को सौंपकर सान्याल व चटर्जी बंगाल चले गये। पार्टी के लिये फण्ड एकत्र करने में कठिनाई को देखते हुए आयरलैण्ड के क्रान्तिकारियों का तरीका अपनाया गया और पार्टी की ओर से पहली डकैती २० दिसम्बर १९२४ को बमरौली में डाली गयी जिसका कुशल नेतृत्व बिस्मिल ने किया था इसका उल्लेख मन्मथनाथ गुप्त   की कई पुस्तकों में मिलता है।

'दि रिवोल्यूशनरी' (घोषणा-पत्र) का प्रकाशन

क्रान्तिकारी पार्टी की ओर से १ जनवरी १९२५ को किसी गुमनाम जगह से प्रकाशित एवं २८ से ३१ जनवरी १९२५ के बीच समूचे हिन्दुस्तान के सभी प्रमुख स्थानों पर वितरित ४ पृष्ठ के पैम्फलेट दि रिवोल्यूशनरी में राम प्रसाद बिस्मिल ने विजय कुमार के छद्म नाम से अपने दल की विचार-धारा का लिखित रूप में खुलासा करते हुए साफ शब्दों में घोषित कर दिया था कि क्रान्तिकारी इस देश की शासन व्यवस्था में किस प्रकार का बदलाव करना चाहते हैं और इसके लिए वे क्या-क्या कर सकते हैं? केवल इतना ही नहीं, उन्होंने गान्धी की नीतियों का मजाक बनाते हुए यह प्रश्न भी किया था कि जो व्यक्ति स्वयं को आध्यात्मिक कहता है वह अँग्रेजों से खुलकर बात करने में डरता क्यों है? उन्होंने हिन्दुस्तान के सभी नौजवानों को ऐसे छद्मवेषी महात्मा के बहकावे में न आने की सलाह देते हुए उनकी क्रान्तिकारी पार्टी में शामिल होने और पार्टी में शामिल हो कर अँग्रेजों से टक्कर लेने का खुला आवाहन किया था। दि रिवोल्यूशनरी के नाम से अँग्रेजी में प्रकाशित इस घोषणापत्र में क्रान्तिकारियों के वैचारिक चिन्तन को आज भी भली-भाँति समझा जा सकता है। स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास  (ग्रन्थावली) के भाग-तीन में पृष्ठ ६४४ से ६४८ तक इस पत्र का अविकल 'हिन्दी काव्यानुवाद' व सरफरोशी की तमन्ना (ग्रन्थावली) के भाग-एक में पृष्ठ १७० से १७४ तक इसका मूल 'अँग्रेजी पाठ' कोई भी व्यक्ति या शोध छात्र दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी में जाकर देख सकता है।
काकोरी-काण्ड की पृष्ठभूमि   

'दि रिवोल्यूशनरी' नाम से प्रकाशित इस ४ पृष्ठीय घोषणापत्र को देखते ही ब्रिटिश सरकार इसके लेखक को बंगाल में खोजने लगी। संयोग से शचीन्द्रनाथ सान्याल बाँकुरा में उस समय गिरफ्तार कर लिये गये जब वे यह पैम्फलेट अपने किसी साथी को पोस्ट करने जा रहे थे। इसी प्रकार योगेशचन्द्र चटर्जी कानपुर से पार्टी की मीटिंग करके जैसे ही हावड़ा स्टेशन पर ट्रेन से उतरे कि एच०आर०ए० के संविधान की ढेर सारी प्रतियों के साथ पकड़ लिये गये और उन्हें हजारीबाग जेल में बन्द कर दिया गया। दोनों प्रमुख नेताओं के गिरफ्तार हो जाने से राम प्रसाद बिस्मिल के कन्धों पर उत्तर प्रदेश के साथ-साथ बंगाल के क्रान्तिकारी सदस्यों का उत्तरदायित्व भी आ गया। बिस्मिल का स्वभाव था कि वे या तो किसी काम को हाथ में लेते न थे और यदि एक बार काम हाथ में ले लिया तो उसे पूरा किये बगैर छोड़ते न थे। पार्टी के कार्य हेतु धन की आवश्यकता पहले भी थी किन्तु अब तो और भी अधिक बढ गयी थी। कहीं से भी धन प्राप्त होता न देख उन्होंने ७ मार्च १९२५ को बिचपुरी तथा २४ मई १९२५ को द्वारकापुर में दो राजनीतिक डकैतियाँ डालीं किन्तु उनमें कुछ विशेष धन उन्हें प्राप्त न हो सका।

इन दोनों डकैतियों में एक-एक व्यक्ति मौके पर ही मारा गया। इससे बिस्मिल की आत्मा को अपार कष्ट हुआ। अन्ततः उन्होंने यह पक्का निश्चय कर लिया कि वे अब केवल सरकारी खजाना ही लूटेंगे, हिन्दुस्तान के किसी भी रईस के घर डकैती बिल्कुल न डालेंगे।

शाहजहाँपुर में उनके घर पर हुई एक इमर्जेन्सी मीटिंग में निर्णय लेकर योजना बनी और ९ अगस्त १९२५ को शाहजहाँपुर रेलवे स्टेशन  से बिस्मिल के नेतृत्व में कुल १० लोग, जिनमें अशफाक उल्ला खाँ, राजेन्द्र लाहिडी, चन्द्रशेखर आजाद, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्त, मुकुन्दी लाल, केशव चक्रवर्ती (छद्मनाम), मुरारीलाल तथा बनवारीलाल  ८ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर रेलगाड़ी में सवार हुए। इन सबके पास पिस्तौलों के अतिरिक्त जर्मनी के बने चार माउजर भी थे जिनके बट में कुन्दा लगा लेने से वह छोटी आटोमेटिक राइफल की तरह लगता था और सामने वाले के मन में भय पैदा कर देता था। इन माउजरों की मारक क्षमता भी अधिक होती थी उन दिनों ये रिवाल्वर आज की ए०के०-४७ की तरह चर्चित थे। लखनऊ से पहले काकोरी रेलवे स्टेशन पर रुक कर जैसे ही गाड़ी आगे बढी, क्रान्तिकारियों ने चेन खींचकर उसे रोक लिया और गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया। उसे खोलने की कोशिश की गयी किन्तु जब वह नहीं खुला तो अशफाक उल्ला खाँ ने अपना माउजर मन्मथनाथ गुप्त को पकड़ा दिया और हथौड़ा लेकर बक्सा तोड़ने में जुट गए। मन्मथनाथ गुप्त ने उत्सुकतावश माउजर का ट्रैगर दबा दिया जिससे छूटी गोली अहमद अली नाम के मुसाफिर को लग गयी। वह मौके पर ही ढेर हो गया। शीघ्रतावश चाँदी के सिक्कों व नोटों से भरे चमड़े के थैले चादरों में बाँधकर वहाँ से भागने में एक चादर वहीं छूट गई। अगले दिन अखबारों के माध्यम से यह खबर पूरे संसार में फैल गयी। ब्रिटिश सरकार ने इस ट्रेन डकैती को गम्भीरता से लिया और सी०आई०डी० इंस्पेक्टर तसद्दुक हुसैन के नेतृत्व में स्कॉटलैण्ड की सबसे तेज तर्रार पुलिस को इसकी जाँच का काम सौंप दिया।

गिरफ्तारी और अभियोग

सी०आई०डी० ने सरकार को जैसे ही इस बात की पुष्टि की कि 'काकोरी ट्रेन डकैती' क्रान्तिकारियों का एक सुनियोजित षड्यन्त्र है, पुलिस ने काकोरी काण्ड के सम्बन्ध में जानकारी देने व षड्यन्त्र में शामिल किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करवाने के लिये इनाम की घोषणा के साथ इश्तिहार सभी प्रमुख स्थानों पर लगा दिये जिसका परिणाम यह हुआ कि पुलिस को घटनास्थल पर मिली चादर में लगे धोबी के निशान से इस बात का पता चल गया कि चादर शाहजहाँपुर के किसी व्यक्ति की है। शाहजहाँपुर के धोबियों से पूछने पर मालूम हुआ कि चादर बनारसीलाल की है। बनारसी लाल से मिलकर पुलिस ने सारा भेद प्राप्त कर लिया। यह भी पता चल गया कि ९ अगस्त १९२५ को शाहजहाँपुर से उसकी पार्टी के कौन-कौन लोग शहर से बाहर गये थे और वे कब-कब वापस आये ? जब खुफिया तौर से इस बात की पुष्टि हो गई कि राम प्रसाद बिस्मिल, जो एच०आर०ए० का लीडर था, उस दिन शहर में नहीं था तो २६ सितम्बर १९२५ की रात में बिस्मिल के साथ समूचे हिन्दुस्तान से ४० लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।

इसके पूर्व भी जैसा कि लिखा जा चुका है काकोरी काण्ड में केवल १० ही लोग वास्तविक रूप से शामिल हुए थे उन सभी को नामजद किया गया। इनमें से पाँच - चन्द्रशेखर आजाद, मुरारीलाल, केशव चक्रवर्ती (केशव बलिराम हेडगेवार का छद्मनाम), अशफाक उल्ला खाँ व शचीन्द्र नाथ बख्शी को छोड़कर, जो पुलिस के हाथ नहीं आये, शेष सभी व्यक्तियों पर अभियोग चला और उन्हें ५ वर्ष की कैद से लेकर फाँसी तक की सजा हुई। फरार अभियुक्तों के अतिरिक्त जिन-जिन क्रान्तिकारियों को 'एच० आर० ए० का सक्रिय कार्यकर्ता होने के सन्देह में गिरफ्तार किया गया था उनमें से १६ को साक्ष्य न मिलने के कारण रिहा कर दिया गया। स्पेशल मजिस्टेट ऐनुद्दीन ने प्रत्येक क्रान्तिकारी की छवि खराब करने में कोई कसर बाकी नहीं रक्खी और केस को सेशन कोर्ट में भेजने से पहले ही इस बात के सभी साक्षी व साक्ष्य एकत्र कर लिये थे कि यदि अपील भी की जाये तो इनमें से एक भी बिना सजा के छूटने न पाये।

बनारसी लाल को हवालात में ही पुलिस ने कड़ी सजा का भय दिखाकर तोड़ लिया। शाहजहाँपुर जिला काँग्रेस कमेटी में पार्टी-फण्ड को लेकर इसी बनारसी का बिस्मिल से झगड़ा हो चुका था और बिस्मिल ने, जो उस समय जिला काँग्रेस कमेटी के ऑडीटर थे, बनारसी पर पार्टी-फण्ड में गवन का आरोप सिद्ध करते हुए काँग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलम्बित कर दिया था। बाद में जब गांधी जी १६ अक्तूबर १९२० (शनिवार) को शाहजहाँपुर आये तो बनारसी ने उनसे मिलकर अपना पक्ष रक्खा। गान्धी ने यह कहकर कि "छोटी-मोटी हेरा-फेरी को इतना तूल नहीं देना चाहिये", इन दोनों में सुलह करा दी।  बनारसी बड़ा ही धूर्त आदमी था उसने पहले तो बिस्मिल से माफी माँग ली फिर अलग जाकर गांधी जी को यह बता दिया कि रामप्रसाद बड़ा ही अपराधी किस्म का व्यक्ति है, वे इसकी किसी बात का न तो स्वयं विश्वास करें न ही किसी और को करने दें। आगे चलकर इसी बनारसी लाल ने बिस्मिल से मित्रता कर ली और मीठी-मीठी बातों से पहले तो उनका विश्वास अर्जित किया बाद में उनके साथ कपड़े के व्यापार में साझीदार भी बन गया। जब बिस्मिल ने गान्धी  की आलोचना करते हुए अपनी अलग पार्टी बना ली तो बनारसी लाल अत्यधिक प्रसन्न हुआ और मौके की तलाश में चुप साधे बैठा रहा। पुलिस ने स्थानीय लोगों से बिस्मिल व बनारसी के पिछले झगड़े का भेद जानकर ही बनारसी लाल को अप्रूवर (सरकारी गवाह) बनाया और बिस्मिल के विरुद्ध पूरे अभियोग में अचूक औजार की तरह इस्तेमाल किया। बनारसी लाल व्यापार में साझीदार होने के कारण पार्टी सम्बन्धी ऐसी-ऐसी गोपनीय बातें जानता था, जिन्हें बिस्मिल के अतिरिक्त और कोई भी न जान सकता था। इस का उल्लेख राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में किया है। यह आत्मकथा हिन्दी विकीसोर्स पर भी उपलब्ध है.

लखनऊ जेल में सभी क्रान्तिकारियों को एक साथ रक्खा गया और हजरतगंज चौराहे के पास 'रिंग थियेटर' नाम की एक आलीशान बिल्डिंग में अस्थाई अदालत का निर्माण किया गया। रिंग थियेटर नाम की यह बिल्डिंग कोठी हयात बख्श और मल्लिका अहद महल के बीच हुआ करती थी जिसमें ब्रिटिश अफसर आकर फिल्म व नाटक आदि देखकर मनोरंजन किया करते थे। इसी 'रिंग थियेटर' में लगातार १८ महीने तक 'किंग इम्परर वर्सेस राम प्रसाद 'बिस्मिल' एण्ड अदर्स' के नाम से चलाये गये इस ऐतिहासिक मुकदमे का नाटक करने में ब्रिटिश सरकार ने १० लाख रुपये उस समय खर्च किये जब सोने का मूल्य २० रुपये तोला (१२ ग्राम)  हुआ करता था। इससे अधिक मजेदार बात यह हुई कि ब्रिटिश हुक्मरानों के आदेश से यह बिल्डिंग भी बाद में ढहा दी गयी और उसकी जगह सन् १९२९-१९३२ में जी०पी०ओ० लखनऊ के नाम से एक दूसरा भव्य भवन ब्रिटिश सरकार खडा कर गयी। १९४७ में जब देश आजाद हो गया तो यहाँ गांधी जी की भव्य प्रतिमा स्थापित करके रही सही कसर हमारे देशी हुक्मरानों ने पूरी कर दी। जब केन्द्र में गैर काँग्रेसी जनता सरकार का पहली बार गठन हुआ तो उस समय के जीवित क्रान्तिकारियों के सामूहिक प्रयासों से सन् १९७७ में आयोजित 'काकोरी शहीद अर्द्धशताब्दी समारोह' के समय यहाँ पर 'काकोरी स्तम्भ' का अनावरण उत्तर प्रदेश के राज्यपाल गणपतिराव देवराव तपासे ने किया ताकि उस स्थल की स्मृति बनी रहे।
 
इस ऐतिहासिक  मुकदमे में सरकारी खर्चे से हरकरननाथ मिश्र को क्रान्तिकारियों का वकील नियुक्त किया गया जबकि जवाहरलाल नेहरू के साले जगतनारायण 'मुल्ला' को एक सोची समझी रणनीति के अन्तर्गत सरकारी वकील बनाया गया जिन्होंने अपनी ओर से सभी क्रान्तिकारियों को कड़ी से कडी सजा दिलवाने में कोई कसर बाकी न रक्खी। यह वही जगतनारायण थे जिनकी मर्जी के खिलाफ सन् १९१६ में बिस्मिल ने लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की भव्य शोभायात्रा पूरे लखनऊ शहर में निकाली थी। इसी बात से चिढकर मैनपुरी षडयंत्र में इन्ही मुल्लाजी ने सरकारी वकील की हैसियत से जोर तो काफी लगाया परन्तु वे राम प्रसाद बिस्मिल का एक भी बाल बाँका न कर पाये थे क्योंकि मैनपुरी षडयंत्र में बिस्मिल फरार हो गये थे और पुलिस के हाथ ही न आये।

फाँसी की सजा और अपील

६ अप्रैल १९२७ को विशेष सेशन जज ए० हैमिल्टन ने ११५ पृष्ठ के निर्णय में प्रत्येक क्रान्तिकारी पर लगाये गये गये आरोपों पर विचार करते हुए यह लिखा कि यह कोई साधारण ट्रेन डकैती नहीं, अपितु ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने की एक सोची समझी साजिश है। हालाँकि इनमें से कोई भी अभियुक्त अपने व्यक्तिगत लाभ के लिये इस योजना में शामिल नहीं हुआ परन्तु चूँकि किसी ने भी न तो अपने किये पर कोई पश्चाताप किया है और न ही भविष्य में इस प्रकार की गतिविधियों से स्वयं को अलग रखने का कोई वचन ही दिया है अतः जो भी सजा दी गयी है सोच समझ कर दी गयी है और इस हालत में उसमें किसी भी प्रकार की कोई छूट नहीं दी जा सकती। किन्तु इनमें से कोई भी अभियुक्त यदि लिखित में पश्चाताप प्रकट करता है और भविष्य में ऐसा न करने का वचन देता है तो उनकी अपील पर अपर कोर्ट विचार कर सकती है।

फरार क्रान्तिकारियों में अशफाक उल्ला खाँ और शचीन्द्र नाथ बख्शी को बहुत बाद में पुलिस गिरफ्तार कर पायी। स्पेशल जज जे०आर०डब्लू० बैनेट की अदालत में काकोरी कांस्पिरेसी का 'सप्लीमेण्ट्री केस' दायर किया गया और १३ जुलाई १९२७ को यही बात दोहराते हुए अशफाक उल्ला खाँ को फाँसी तथा शचीन्द्रनाथ बख्शी को आजीवन कारावास की सजा सुना दी गयी। सेशन जज के फैसले के खिलाफ १८ जुलाई १९२७ को अवध चीफ कोर्ट में अपील दायर की गयी। चीफ कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सर लुइस शर्ट और विशेष न्यायाधीश मोहम्मद रजा के सामने दोनों मामले पेश हुए। जगतनारायण 'मुल्ला' को सरकारी  पक्ष रखने का काम सौंपा गया जबकि सजायाफ्ता क्रान्तिकारियों की ओर से के०सी० दत्त,जयकरणनाथ मिश्र व कृपाशंकर हजेला ने क्रमशः राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह व अशफाक उल्ला खाँ की पैरवी की। राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी पैरवी खुद की क्योंकि सरकारी खर्चे पर उन्हें लक्ष्मीशंकर मिश्र नाम का एक बड़ा साधारण-सा वकील दिया गया था जिसको लेने से  उन्होंने साफ मना कर दिया। बिस्मिल ने चीफ कोर्ट के सामने जब धाराप्रवाह अंग्रेजी में फैसले के खिलाफ बहस की तो सरकारी वकील मुल्ला जी बगलें झाँकते नजर आये। इस पर चीफ जस्टिस लुइस शर्टस् को बिस्मिल से यह पूछना पड़ा- "मिस्टर रामप्रसाड! फ्रॉम भिच यूनीवर्सिटी यू हैव टेकेन द डिग्री ऑफ ला?" (राम प्रसाद! तुमने किस विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री ली?) इस पर बिस्मिल ने हँस कर कहा था- "एक्सक्यूज मी सर! ए किंग मेकर डजन्ट रिक्वायर ऐनी डिग्री।" (क्षमा करें महोदय! सम्राट बनाने वाले को किसी डिग्री की आवश्यकता नहीं होती।)

अदालत ने उनके इस जबाव से चिढकर बिस्मिल की १८ जुलाई १९२७ को दी गयी स्वयं वकालत करने की अर्जी खारिज कर दी। उसके बाद उन्होंने ७६ पृष्ठ की तर्कपूर्ण लिखित बहस पेश की जिसे देखकर जजों ने यह शंका व्यक्त की कि यह बिस्मिल ने स्वयं न लिखकर किसी विधिवेत्ता से लिखवायी है। अन्ततोगत्वा उन्हीं लक्ष्मीशंकर मिश्र को बहस करने की इजाजत दी गयी बिस्मिल को नहीं। क्योंकि अगर बिस्मिल को पूरा मुकदमा खुद लडने की छूट दी जाती तो सरकार शर्तिया केस हार जाती।

चीफ कोर्ट में शचीन्द्रनाथ सान्याल, भूपेन्द्रनाथ सान्याल व बनवारी लाल को छोड़कर शेष सभी क्रान्तिकारियों ने अपील की थी। २२ अगस्त १९२७ को जो फैसला सुनाया गया उसके अनुसार राम प्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी व अशफाक उल्ला खाँ को आई०पी०सी० की दफा १२१(ए) व १२०(बी) के अन्तर्गत आजीवन कारावास तथा ३०२ व ३९६ के अनुसार फाँसी एवं ठाकुर रोशन सिंह को पहली दो दफाओं में ५+५ कुल १० वर्ष की कड़ी कैद तथा अगली दो दफाओं के अनुसार फाँसी का हुक्म हुआ। शचीन्द्रनाथ सान्याल,जब जेल में थे तभी लिखित रूप से अपने किये पर पश्चाताप प्रकट करते हुए भविष्य में किसी भी क्रान्तिकारी कार्रवाई में हिस्सा न लेने का वचन दे चुके थे जिसके आधार पर उनकी उम्र-कैद बरकरार रही। उनके छोटे भाई भूपेन्द्रनाथ सान्याल व बनवारी लाल ने अपना-अपना जुर्म कबूल करते हुए कोर्ट की कोई भी सजा भुगतने की अण्डरटेकिंग पहले ही दे रखी थी इसलिये उन्होंने अपील नहीं की और दोनों को ५-५ वर्ष की सजा के आदेश यथावत रहे। चीफ कोर्ट में अपील करने के बावजूद योगेशचन्द्र चटर्जी, मुकुन्दी लाल व गोविन्दचरण कार की सजायें १०-१० वर्ष से बढाकर उम्र-कैद में बदल दी गयीं। सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य व विष्णुशरण दुब्लिश की सजायें भी यथावत् (७-७ वर्ष) रहीं। खूबसूरत हैण्डराइटिंग में लिखकर अपील देने के कारण केवल प्रणवेश चटर्जी की सजा को ५ वर्ष से घटाकर ४ वर्ष कर दिया गया।

चीफ कोर्ट का फैसला आते ही समूचे देश में सनसनी फैल गयी। ठाकुर मनजीत सिंह राठौर ने सेण्ट्रल लेजिस्लेटिव कौन्सिल में काकोरी काण्ड के सभी फाँसी (मृत्यु-दण्ड) प्राप्त कैदियों की सजायें कम करके आजीवन कारावास (उम्र-कैद) में बदलने का प्रस्ताव पेश करने की सूचना दी। कौन्सिल के कई सदस्यों ने सर विलियम मोरिस को, जो उस समय प्रान्त के गवर्नर थे, इस आशय का एक प्रार्थना-पत्र भी दिया किन्तु उसने उसे अस्वीकार कर दिया।

सेण्ट्रल कौन्सिल के ७८ सदस्यों ने तत्कालीन वायसराय व गवर्नर जनरल एडवर्ड फ्रेडरिक लिण्डले वुड को शिमला  में हस्ताक्षर युक्त मेमोरियल भेजा जिस पर प्रमुख रूप से पं० मदन मोहन मालवीय, मोहम्मद अली जिन्ना, एन० सी० केलकर, लाला लाजपत राय, गोविन्द वल्लभ पन्त, आदि ने हस्ताक्षर किये थे किन्तु वायसराय पर उसका भी कोई असर न हुआ। अन्त में मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में पाँच व्यक्तियों का एक प्रतिनिधि मण्डल शिमला जाकर वायसराय से मिला और उनसे यह प्रार्थना की कि चूँकि इन चारो अभियुक्तों ने लिखित रूप में सरकार को यह वचन दिया है कि वे भविष्य में इस प्रकार की किसी भी गतिविधि में हिस्सा न लेंगे और उन्होंने अपने किये पर पश्चाताप भी प्रकट किया है अतः जजमेण्ट पर पुनर्विचार किया जा सकता है किन्तु वायसराय ने उन्हें साफ मना कर दिया। अन्ततः बैरिस्टर मोहन लाल सक्सेना ने प्रिवी कौन्सिल में क्षमादान की याचिका के दस्तावेज तैयार करके इंग्लैण्ड के विख्यात वकील एस० एल० पोलक के पास भिजवाये किन्तु लन्दन के न्यायाधीशों व सम्राट के वैधानिक सलाहकारों ने उस पर यही दलील दी कि इस षड्यन्त्र का सूत्रधार राम प्रसाद बिस्मिल बड़ा ही खतरनाक और पेशेवर अपराधी है उसे यदि क्षमादान दिया गया तो वह भविष्य में इससे भी बड़ा और भयंकर काण्ड कर सकता है। उस स्थिति में सरकार को हिन्दुस्तान में शासन करना असम्भव हो जायेगा। इसका परिणाम यह हुआ कि प्रिवी कौन्सिल में भेजी गयी क्षमादान की अपील भी खारिज हो गयी।

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नोट: जो इस ब्लॉग को पढने के बाद राम प्रसाद 'बिस्मिल' के बारे में अधिक जानकारी चाहते हों वे कृपया हिन्दी विकिपीडिया पर राम प्रसाद 'बिस्मिल' अवश्य देखें.

Note: Those viewers of this blog want more information about Ram Prasad Bismil they must search Ram Prasad Bismil on English Wikipedia.

Thursday, July 28, 2011

Shankar Dayal Singh


आलेख : डॉ. मदन लाल वर्मा 'क्रान्त'
शंकर दयाल सिंह 
शंकर दयाल सिंह (१९३७-१९९५) भारत के राजनेता तथा हिन्दी साहित्यकार थे। वे राजनीति व साहित्य दोनों क्षेत्रों में समान रूप से लोकप्रिय थे। उनकी असाधारण हिन्दी सेवा के लिये उन्हें सदैव स्मरण किया जाता रहेगा। उनके सदाबहार बहुआयामी व्यक्तित्व में ऊर्जा और आनन्द का अजस्र स्रोत छिपा हुआ था। उनका अधिकांश जीवन यात्राओं में ही बीता और यह भी एक विचित्र संयोग ही है कि उनकी मृत्यु भी यात्रा के दौरान उस समय हुई जब वे संसद के शीतकालीन अधिवेशन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने पटना से दिल्ली आ रहे थे। नई-दिल्ली रेलवे स्टेशन पर २७ नवम्बर १९९५  की सुबह ट्रेन से कहकहे लगाते हुए शंकर दयाल सिंह नहीं उतरे, वोझिल मन से उनके परिजनों ने उनके शव को उतारा।

 

जन्म और जीवन

बिहार के औरंगाबाद जिले के भवानीपुर देव गाँव में २७ दिसम्बर १९३७ को प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी, साहित्यकार व बिहार परिषद के सदस्य स्व० कामताप्रसाद सिंह के यहाँ जन्मे बालक के माता-पिता ने अपने आराध्य देव शंकर की दया का प्रसाद समझ कर उसका नाम शंकर दयाल रखा जो जाति सूचक शब्द के संयोग से शंकर दयाल सिंह हो गया। छोटी उम्र में ही माता का साया सिर से उठ गया अत: दादी ने उनका पालन पोषण किया। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक (बी०ए०) तथा पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (एम०ए०) की उपाधि (डिग्री) लेने के पश्चात १९६६ में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने और १९७१ में सांसद चुने गये। एक पाँव राजनीति के दलदल में सनता रहा तो दूसरा साहित्य के कमल की पांखुरियों को कुरेद-कुरेद कर जन - जन में  उसका सौरभ लुटाता रहा। श्रीमती कानन बाला जैसी सुशीला प्राध्यापिका पत्नी, दो पुत्र - रंजन व राजेश तथा एक पुत्री - रश्मि; और क्या चाहिये सब कुछ तो उन्हें अपने जीते जी मिल गया था तिस पर मृत्यु भी मिली तो इतनी नीरव इतनी शान्त कि शरीर को एक पल का भी कष्ट नहीं होने दिया।

विविध  कार्य

समाचार भारती के निदेशक पद से प्रारम्भ हुई शंकर दयाल सिंह की जीवन-यात्रा संसदीय राजभाषा समिति, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी, भारतीय रेल परामर्श समिति, भारतीय अनुवाद परिषद, केन्द्रीय हिन्दी सलाहकार समिति जैसे अनेक पडावों को पार करती हुई देश-विदेश की यात्राओं का भी आनन्द लेती रही और अपने सहयात्रियों के साथ उन्मुक्त ठहाके लगाकर उनका रक्तवर्धन भी करती रही। और अन्त में उनकी यह यात्रा रेलवे के वातानुकूलित शयनयान में गहरी नींद सोते हुए २७ नवम्बर १९९५ को उस समय समाप्त हो गयी जब उनके जन्म दिन की षष्टिपूर्ति में मात्र एक मास शेष रह गया था। यदि २७ दिसम्बर १९९५ के बाद भी उनकी यात्रा जारी रहती तो अपना ६०वाँ जन्म-दिन उन्हीं ठहाकों के बीच मनाते जिसके लिये वे अपने मित्रों के बीच जाने जाते थे। उनकी एक विशेषता यह भी रही कि उन्होंने जीवन पर्यन्त भारतीय जीवन मूल्यों की रक्षा के साथ-साथ भारतीय संस्कृति का पोषण किया भले ही इसके लिये उन्हें कई बार उलझना भी पडा किन्तु अपने विशिष्ट व्यवहार के कारण वे उन तमाम वाधाओं पर एक अपराजेय योद्धा की तरह विजय पाते रहे।

राजनीति की धूप

शंकर दयाल सिंह लोकसभाराज्यसभा दोनों के सदस्य रहे किन्तु चूँकि मूलत: वे एक साहित्यकार थे अत: राजनीति में होने वाले दाव पेंच उन्हें रास नहीं आते थे और वे उसकी तेज धूप से बचने के लिये बहुधा साहित्य का छाता तान लिया करते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि वे अपने लेखों में उन सबकी बखिया उधेड कर रख देते थे जो उनके शुद्ध अन्त:करण को नीति विरुद्ध लगते थे। जैसे सरकार की ग्रामोत्थान के प्रति तटस्थता का भाव उन्हें सालता था तो वह संसद की चर्चाओं में तो अपनी बात रखते ही थे विविध पत्र-पत्रिकाओं में लेख भी लिखते थे जिन्हें पढकर विरोधी-पक्ष खुश और सत्ता-पक्ष (कांग्रेस), जिसके वे स्वयं सांसद हुआ करते थे, नाखुश रहता था। देखा जाये तो राजनीति में, आज जहाँ प्रत्येक पार्टी ने केवल चाटुकारों की चण्डाल-चौकडी का मजमा जमा कर रक्खा है जिसके कारण राजनीति के तालाब में स्वच्छ जल की जगह कीचड ही कीचड नजर आ रही है; वहाँ के प्रदूषित वातावरण में शंकरदयाल सिंह सरीखे कमल की कमी वास्तव में खलती है। उन्होंने लगभग २५ लेख राजनीतिक उठापटक को लेकर ही लिखे जो तत्कालीन समाचारों की सुर्खियाँ तो बने ही, पुस्तकाकार रूप में पुस्तकालयों में उपलब्ध भी हैं।

साहित्य की छाँव

जीवन को धूप-छाँव का खेल मानने वाले शंकर दयाल सिंह का यह मानना एक दम सही था कि जिस प्रकार प्रकृति अपना संतुलन अपने आप कर लेती है उसी प्रकार राजनीति में काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को साहित्यकार होना पहली योग्यता का मापदण्ड होना चाहिये। वे अपने से पूर्ववर्ती सभी दिग्गज राजनीतिक व्यक्तियों का उदाहरण प्राय: दिया करते थे और बताते थे कि वे सभी दिग्गज लोग साहित्यकार पहले थे बाद में राजनीतिकार या कुछ भी; जिसके कारण उनके जीवन में निरन्तर सन्तुलन बना रहा और वे देश के साथ कभी धोखा नहीं कर पाये। आज जिसे देखो वही राजनीति को व्यवसाय की तरह समझता है सेवा की तरह नहीं; यही कारण है कि सर्वत्र अशान्ति का साम्राज्य है। हालात यह हैं कि आजकल राजनीति की धूप में नेताओं के पाँव कम, जनता के अधिक झुलस रहे हैं। उन्हीं के शब्दों में - "मैंने स्वयं राजनीति से आसव ग्रहण कर उसकी मस्ती साहित्य में बिखेरी है। अनुभव वहाँ से लिये, अनुभूति यहाँ से। मरण वहाँ से वरण किया जीवन यहाँ से। वहाँ की धूप में जब-जब झुलसा,छाँव के लिये इस ओर भागा। लेकिन यह सही है कि धूप्-छाँव का आनन्द लेता रहा, आँख-मिचौनी खेलता रहा।" (उद्धरण:-राजनीति की धूप : साहित्य की छाँव शंकर दयाल सिंह पृष्ठ ११७ से)

भाषा की भँवर में

भारतवर्ष को स्वतन्त्रता के पश्चात यदि कोई एक नीति एकजुट रख सकती थी तो वह केवल एक भाषागत राष्ट्रीय-नीति ही रख सकती थी किन्तु हमारे देश के कर्णधारों ने इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया अपितु एक के बजाय अनेक भाषाओं के भँवर-जाल में उलझाकर डूब मरने के लिये विवश कर दिया है। जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अथवा हमारी आजादी का युद्ध एक भाषा हिन्दी के माध्यम से लडा गया, उसमें किसी भी प्रान्त-भाषा-भाषी ने यह अडंगा नहीं लगाया कि पहले उनकी भाषा सीखो तभी वे एकजुट होकर तुम्हारा साथ देंगे अन्यथा नहीं देंगे। इस तरह यदि करते तो क्या कभी १९४७ में हिन्दुस्तान आजाद हो सकता था? कदापि नहीं। राष्ट्र-भाषा तो एक ही हो सकती है अनेक तो नहीं हो सकतीं। यदि राष्ट्र-भाषायें एक के स्थान पर १५ या २० कर दी जायेंगी तो निश्चित मानिये प्रान्तीयता का भाव प्रत्येक के मन में पैदा होगा और उसका दुष्परिणाम यह होगा कि यह राष्ट्र विखण्डन की ओर अग्रसर होगा, एकता की ओर नहीं।

यायावरी के अनुभव

शंकर दयाल सिंह चूँकि सांसद भी रहे और संसदीय कार्य-समितियों में उनकी पैठ भी बराबर बनी रही अतएव उन्हें सरकारी संसाधनों के सहारे विभिन्न देशों व स्थानों की यात्रायें करने का सुख भी उपलब्ध हुआ। परन्तु उन्होंने वह सुख अकेले न उठाकर अपने साहित्यिक मित्रों को भी उपलब्ध कराया तथा लेखों के माध्यम से अपने पाठकों को भी पहुँचाया। सोवियत संघ की राजधानी मास्को से लेकर सूरीनाम और त्रिनिदाद तक की महत्वपूर्ण यात्राओं के वृतान्त पढकर हमें यह लगता ही नहीं कि शंकर दयाल सिंह हमारे बीच नहीं हैं। अपितु कभी-कभी तो ऐसा आभास-सा होता है जैसे वह हमारे इर्द-गिर्द घूमते हुए लट्टू की भाँति गतिमान इस भूमण्डल के चक्कर अभी भी लगा रहे हैं। पारिजात प्रकाशन, पटना से प्रथम बार सन् १९९२ में प्रकाशित पुस्तक राजनीति की धूप : साहित्य की छाँव में पृष्ठ ३०१ से ३३१ तक लेखों के माध्यम से दिये उनकी यायावरी (घुमक्कडी वृत्ति) के अनुभव बडे ही रोचक हैं।

रचना संसार

सन १९७७ से 'सोशलिस्ट भारत' में उनके लेख प्रकशित होने प्रारम्भ हुए जो सन १९९२ तक अनवरत रूप से छपते ही रहे ऐसा उल्लेख उनकी बहुचर्चित पुस्तक राजनीति की धूप : साहित्य की छाँव  में पृष्ठ ३४४-३४५ पर मिलता है। इसी के आगे दी गयी शंकरदयाल सिंह की प्रकाशित पुस्तकों की सूची इस प्रकार है:
  1. राजनीति की धूप:साहित्य की छाँव
  2. इमर्जेन्सी:क्या सच,क्या झूठ
  3. परिवेश का सुख
  4. मैने इन्हें जाना
  5. यदा-कदा
  6. भीगी धरती की सोंधी गन्ध
  7. अपने आपसे कुछ बातें
  8. आइये कुछ दूर हम साथ चलें
  9. कहीं सुबह:कहीं छाँव
  10. जनतन्त्र के कठघरे में
  11. जो साथ छोड गये
  12. भाषा और साहित्य
  13. मेरी प्रिय कहानियाँ
  14. एक दिन अपना भी
  15. कुछ बातें:कुछ लोग
  16. कितना क्या अनकहा
  17. पह्ली बारिस की छिटकती बूँदें
  18. बात जो बोलेगी
  19. मुरझाये फूल:पंखहीन
  20. समय-सन्दर्भ और गान्धी
  21. समय-असमय
  22. यादों की पगडण्डियाँ
  23. कुछ ख्यालों में:कुछ ख्वाबों में
  24. पास-पडोस की कहानियाँ
  25. भारत छोडो आन्दोलन

सम्मान व पुरस्कार

राष्ट्रभाषा हिन्दी के लिये शंकर दयाल सिंह ने आजीवन आग्रह भी किया, युद्ध भी लडा और यदा-कदा आहत भी हुए। इस सबके बावजूद उन्हें सन् १९९३ में अनन्तगोपाल शेवडे हिन्दी सम्मान तथा सन् १९९५ में गाड्गिल राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया परन्तु इससे वे पूर्णत: मानसिक रूप से सन्तुष्ट नहीं कभी नहीं हुए। निस्सन्देह शंकर दयाल सिंह पुरस्कार या सम्मान पाकर अपनी बोलती बन्द कर देने वालों की श्रेणी के व्यक्ति नहीं, अपितु और अधिक प्रखरता से मुखर होने वालों की श्रेणी के व्यक्ति थे। यही कारण था कि प्रतिष्ठित लेखक के रूप में केन्द्र सरकार ने भले ही कोई पुरस्कार या सम्मान न दिया हो, जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे; परन्तु देश भर से कई संस्थाओं, संगठनों व राज्य-सरकारों से उन्हें अनेकों पुरस्कार प्राप्त हुए।

 सन्दर्भ एवम् आभार

  1. राजनीति की धूप : साहित्य की छाँव शंकर दयाल सिंह १९९२ पारिजात प्रकाशन पटना-१
  2. मेरे ये आदरणीय और आत्मीय आशा रानी व्होरा २००२ नमन प्रकाशन नई दिल्ली-२ ISBN : 8187368071
( डॉ० मदन लाल वर्मा 'क्रान्त' का यह आलेख हिन्दी विकीपीडिया से साभार उद्धृत है  ).  http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B0_%E0%A4%A6%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B9 ( पुष्ठि के लिये साईट देखें )

Friday, July 22, 2011

tulsi eulogy

तुलसी स्तवन

तुलसी ने मानस लिखा था जब जाति-पाँति-सम्प्रदाय-ताप से धरम-धरा झुलसी.
झुलसी धरा के त्रण-संकुल पे मानस की पावसी-फुहार से हरीतिमा -सी हुलसी.
हुलसी हिये में हरि-नाम की कथा अनन्त सन्त के समागम से फूली-फली कुल-सी.
कुल-सी लसी जो प्रीति राम के चरित्र में तो राम-रस जग को चखाय गये तुलसी.

आत्मा थी राम की पिता में सो प्रताप-पुंज आप रूप गर्भ में समाय गये तुलसी.
जन्मते ही राम -नाम मुख से उचारि निज नाम रामबोला रखवाय गये तुलसी.
रत्नावली-सी अर्धांगिनी सों सीख पाय राम सों प्रगाढ़ प्रीति पाय गये तुलसी.
मानस में राम के चरित्र की कथा को गाय राम-रस जग को चखाय गये तुलसी.

Tulsi Eulogy
(Lyrical Translation)

Tulsi wrote Manas when cast creed communal heat had hit on earth the humanity.
It was breez of first rain that was blown from Manas to save the community.
Each of us got such a beautyful thought in the form of Ram and his entity.
That whole world became fan of Ram and Ram brought in the world an unity.

It was soul of Ram in Atmaram that took birth in the form of Tulsi.
Since he spoke name of Ram at birth hence was named as Rambola Tulsi. 
From Ratnavali he got the attachment with Ram and he became saint Tulsi.
Wrote an epic the Manas to read which world knew the Ram such a great was Tulsi.

Wednesday, July 20, 2011

The Alternative

The Alternative
(English Version of Vikalp)

That day the trend of country will change,
When its youth will accept the challange.

No one can do any thing in life,
Until & unless he does'nt resolve.
A resolve can not emerge in mind,
Until it is sound enough to evolve.

How will the body be sound enough,
Body of whose is lean an thin.
How will survive culture there,
Where the one third race is din.

This is the land where Shiva was born,
And Pratap loitered in forest throughout.
Patriot-Poet of Pen and Pistol,
Bismil was enough to kick them out.

The British Empire was shaken from within,
By Kakori Conspiracy Case so badly.
He sacrificed himself but to masses he gave,
The message that brought here dawn so early.

The lion-hearted Azad who put to task,
The highest rank and file of forces.
Bhagat Singh's body was whipped to blood,
Yet his conscience never became a witness.

Of which clay were really made they,
Who did not bow but given away.
Their lives for sake of country's health,
And we are running after women & wealth!

Today's youth is blindly running,
Aftere every sort of luxurious life.
Forgetting his golden culture he takes,
The western brass in the arms as wife.

What's going on in the country today,
He does'nt think but minds his business.
Any one may do whatsoever he may,
He won't bother but keeps his mistress.

His only job is to cut accross shelter,
Whether it be right or wrong, no maatter.
He can call even ass - "O Father!"
Anyhow be all the way his favour.

Not even a single Leader in such a big Nation,
Everyone is keeping up his Image better.
Seldom are Poets who speak up the Truth,
Otherwise most are Joker or Singer.

If every youth wants our country be greater,
Then each one of us will have to correct,
Himself. otherwise in future, no doubt,
We will lose again like past, it's a fact.

Monday, July 18, 2011

विकल्प

मैं, एस०के०गुप्त, प्रो० वी०के० मल्होत्रा एवं श्री अटलबिहारी वाजपेयी


नक्शा उस दिन सम्पूर्ण देश का बदलेगा जब युवा वर्ग ये चुनौतियाँ स्वीकारेगा

खाली बैठे-बैठे न व्यक्ति कुछ कर पाता जब तक उसमें संकल्प-भाव उत्पन्न न हो,
संकल्प-भाव तब तक उत्पन्न नहीं होता जब तक उसका मस्तिष्क शक्ति-सम्पन्न न हो.
मस्तिष्क शक्ति-सम्पन्न वहाँ कैसे होगा काया मनुष्य की जहाँ पूर्ण जर्जर होगी,
सभ्यता वहाँ कैसे जिन्दा रह पायेगी सम्पूर्ण जाति की जाति  जहाँ बर्बर होगी.

यह वही देश है जहाँ शिवा ने जन्म लिया प्रणवीर प्रताप जहाँ जंगल में भटका था,
पिस्तौल-कलम का धनी शायरे-इन्कलाब बिस्मिल अंग्रेजों की आँखों में खटका था.
करके काकोरी-काण्ड समूचे शासन की चूलों को जड़ तक उसने ऐसा हिला दिया,
खुद खाक भले हो गया मगर बलि देकर के अंग्रेज-राज्य मिट्टी में उसने मिला दिया.

आज़ाद चन्द्रशेखर का लोहा मान गये थे बड़े-बड़े अंग्रेज सिपाही अधिकारी,
बेशक शरीर पर अनगिन कोड़े पड़े मगर था भगत सिंह जो बना गवाह न सरकारी.
किस मिट्टी के थे बने हुए वे कर्मवीर जो झुके नहीं जुल्मों के आगे टूट गये,
हम हैं जिनको ऐश्वर्य गुलाम बनाये है, है यही वजह जो हम सब पीछे छूट गये.

आज का युवक भोगों के पीछे अन्धा हो भागता जा रहा तेजी से मुँह बाये है,
अपनी संस्कृति को भुला विवश नादानी में वह नक़ल विदेशी लोगों की अपनाये है.
हो रहा देश में क्या इसका कुछ पता नहीं उसको अपने व्यापारों से अवकाश कहाँ?
जो जैसा चाहे जब-जब जहाँ-जहाँ चाहे वह करता जाये इसकी उसे तलाश कहाँ?

उसका है केवल एक काम आश्रय पाना चाहे वह सही गलत कैसे भी मिल पाये,
मतलब निकले तो गधा बाप बन सकता है बस किसी तरह से उल्लू सीधा हो जाये.
इस इतने बड़े राष्ट्र में नायक एक नहीं सब के सब अपनी ही छबि के उन्नायक हैं,
कवियों में विरले हैं जो सच कह पाते हैं वर्ना अधिकाँश विदूषक हैं या गायक हैं.

यदि हम चाहें यह राष्ट्र परम वैभव पाये तो संस्कार मय जन-जन को होना होगा,
अन्यथा राष्ट्र अब तक खोता ही आया है अपने गुरुत्व को आगे भी खोना होगा.

Friday, July 8, 2011

Devil of Democracy

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Monday, July 4, 2011

India will never prosper unless ?

भारत का तब तक उत्थान न होगा.

जब तक यहाँ शहीदों का समुचित सम्मान न होगा,
निश्चित समझो तब तक भारत का उत्थान न होगा.

वेदों ने बलिदान शब्द को मुक्त कंठ से गाया,
यज्ञों में मानव आहुति को सर्वश्रेष्ठ बतलाया.
सत्य अहिंसा के बल पर हमने आज़ादी पायी,
यह असत्य परिभाषा हमको अब तक गयी पढ़ायी.

जिनके पौरुष और पराक्रम ने यह दिन दिखलाया,
उन सबको षड्यन्त्र पूर्वक अब तक  गया मिटाया.

गान्धी ने सन बाइस में जब आन्दोलन रुकवाया,
तब कुछ क्रान्तिकारियों ने अपना संगठन बनाया.
एक जनवरी सन पच्चिस को इश्तहार छपवाया,
कैसा परिवर्तन होगा विस्तार सहित बतलाया.

अंग्रेजों को अंग्रेजी में लिखकर यह समझाया,
भारत छोडो बरना समझो काल तुम्हारा आया.

नौ अगस्त पच्चिस को काकोरी में किया धमाका,
खुली चुनौती देकर जिसने ब्रिटिश राज्य को हाँका.
हिन्दुस्तानी प्रजातन्त्र का संविधान निर्माता,
बलिदानी प्रेरणा-श्रोत ग़ज़लों का वह उद्गाता.

अपनी आहुति देकर उसने ऐसी आग लगायी,
गान्धी  की तमाम कोशिश के बाद न जो बुझ पायी.

आखिर सत्रह साल बाद उन्नीस सौ ब्यालिस आया,
अंग्रेजों के नाम खुला ख़त गान्धी ने भिजवाया.
उसमें लिक्खा-"सभी पढ़ें जो चिट्ठी मैंने दी है,
मैं हूँ वह नाकिस जिसने तुम सबकी रक्षा की है.

बीस साल तक भीख माँगकर मैंने क्या पाया है,
वह मेरी गलती थी मुझको आज समझ आया है.

तुम लातों के भूत बात  से  नहीं  मानने  वाले, 
अब मैं कहता हूँ- जिसको जो करना हो कर डाले."
काश! यही ख़त सन बाइस में गान्धीजी भिजवाते,
तो इतने सारे शहीद क्यों अपनी जान गँवाते.

इससे तो यह सिद्ध हुआ बिस्मिल की बात सही थी,
अंग्रेजों का भूत भगाने की बस दवा यही थी.

गान्धी ने सर्वथा दोगली नीति यहाँ अपनायी,
पहले आग लगायी फिर फायर ब्रिगेड पहुँचायी.
जिससे वायसराय कभी नाराज न होने पाये,
और छोड़ना पड़े देश तो गान्धी को दे जाये.

वही हुआ जब सैंतालिस में मिली हमें आज़ादी,
टुकड़ों में बँट गया देश नफरत ऐसी फैला दी.

लोकतन्त्र की खाल ओढ़कर वंशवाद घुस आया,
राष्ट्रपिता के पुत्रों ने गान्धी का नाम भुनाया.
गोरखपुर में बिस्मिल की अन्त्येष्टि जहाँ पर की थी,
उस स्थल को राजघाट की संज्ञा सबने दी थी.

गान्धी के मानस पुत्रों ने की कैसी चतुराई,
बिस्मिल को विस्मृत करने की विस्तृत नीति बनाई.

भारत छोड़ो आन्दोलन महिमामंडित करवाया,
गान्धी की समाधि पर सुन्दर राजघाट बनवाया.
'काकोरी षड्यन्त्र काण्ड' को भूले भारतवासी,
गोरखपुर के राजघाट की रही न याद जरा सी.

नौ अगस्त सन ब्यालिस के स्टेच्यू बने हुए हैं,
आगे-आगे गान्धी पीछे चमचे तने हुए हैं.

बिस्मिल औ' अशफाक किसी का कोई नाम नहीं है,
पूछो तो कहते हैं इनका कोई काम नहीं है.
सन उन्निस सौ बाइस में जब गान्धी जा दुबके थे,
तब कुछ सरफ़रोश ही थे जो सूरज से चमके थे.

अगर उस समय बिस्मिल औ' अशफाक न आगे आते,
निश्चित समझो अब तक हम आजाद नहीं हो  पाते.

आज समूचा देश क्रान्ति की भाषा भूल चुका है,
लोकतन्त्र की अर्थवान परिभाषा भूल चुका है.
देश-धर्म पर मर मिटने का जज्वा आज नहीं है,
सरफ़रोश लोगों का वैसा मजमा आज नहीं है.

जब तक बिस्मिल जैसे युवकों का गुणगान न होगा,
निश्चित समझो तब तक भारत का उत्थान न होगा.



Saturday, July 2, 2011

Country or a tool ?

देश है या झुनझुना?

क्या यही दिन देखने को था तुम्हें हमने चुना,
जिस तरह चाहो बजा लो देश है या झुनझुना?

ताक पर रखकर नियम क़ानून सारे क़ायदे,
सो गया जनतन्त्र सिरहाने लगाकर वायदे;
आदमी है सिर्फ़ वोटर-लिस्ट का पन्ना घुना,
जिस तरह चाहो बजा लो देश है या झुनझुना?

हैं विदेशी साजिशें फिर देश में सुरसा मुखी,
धर्म का धारक सकल सामान्य जन सबसे दुखी;
भूख का हल खोजते हैं पेट रखकर कुनमुना,
जिस तरह चाहो बजा लो देश है या झुनझुना?

गोल बैंगन की तरह जो थालियों में आ गये,
दर असल वे लोग ही यह लोकतन्त्र पचा गये;
आम जनता की समस्या को यहाँ किसने सुना,
जिस तरह चाहो बजा लो देश है या झुनझुना?

Tuesday, June 28, 2011

Ram Prasad Bismil Udyan in Greater Noida

              अमर शहीद
 पं॰रामप्रसाद 'बिस्मिल' उद्यान:
 यह उद्यान (बगीचा) रामपुर जागीर की उस ऐतिहासिक बीहड़ भूमि पर ग्रेटर नोएडा प्रशासन द्वारा विकसित किया गया है जहाँ 20वीं शताब्दी के महान क्रान्तिकारी व 'काकोरी काण्ड' के अमर शहीद पंडित रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने सन्‌ 1918 के 'मैनपुरी षड्‌यन्त्र' में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष के दौरान भूमिगत रहते हुए चरवाहे का भेष धारण कर यहाँ के गुर्जरों की गाय-भैंस चराईं और इन्हीं जंगलों मेँ  अपना क्रान्तिकारी उपन्यास 'बोल्शेविकों की करतूत' लिखा जो ब्रिटिश सरकार द्वारा छपते ही जब्त कर लिया गया।

'बोल्शेविक' शब्द मूलत: रूसी भाषा का है जिसका हिन्दी में अर्थ होता है 'बहुजन समाज के लोग'। इसका उल्लेख इस उपन्यास मेँ पृष्ठ सं॰ 125 पर मिलता है। बिस्मिल जी के भूमिगत जीवन का बड़ा ही मनोरंजक वर्णन उनकी आत्मकथा मेँ भी मिलता है। 'रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा' आजकल इन्टरनेट पर भी उपलब्ध है। सम्पर्क लिंक है:
http://wikisource.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A4%B0_%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%A6_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6_%27%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B2%27_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE
हम उत्तर प्रदेश सरकार व ग्रेटर नोएडा प्रशासन को साधुवाद देते हैं कि उन्होंने इस दिशा में एक सार्थक पहल की इसके साथ-साथ यह अनुरोध भी करते हैं कि इस ऐतिहासिक उद्यान का निर्माण तथा रख-रखाव उत्तम कोटि का हो ताकि सरकार की उद्यान व पार्क निर्माण नीति पर कोई प्रश्न-चिन्ह न लग सके.

हमें उम्मीद है इस क्षेत्र के सांसद व सरकार में भागीदार सभी लोग हमारे इस सुझाव पर गंभीरता से विचार करेंगे. यदि इस उद्यान ( बाग़ ) में  अमर शहीद  पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल' की मूर्ति उनके आगामी बलिदान-दिवस   १९ दिसम्बर २०११  से पूर्व स्थापित हो सके तो सोने पर सुहागे की उक्ति सार्थक होगी.