Tuesday, May 31, 2011

Opposite Poles Of Politics?

लोकतन्त्र का चीरहरण

खुले खजाने लुट रही , लोकतन्त्र की लाज ;
खरबों की संपत्ति है , स्विस बैंक में आज.
स्विस बैंक में आज , वही जनतन्त्र चलाते;
आम  आदमी     को    महँगाई   से     मरवाते.
कहें 'क्रान्त' उस प्रजातन्त्र के हैं क्या माने;
जनता का  धन    लूटा   जाये    खुले   खजाने.

 27   में लिख गये , बिस्मिल जी यह बात;
 आज़ादी यदि मिल गयी,  हमको रातों- रात . 
 हमको  रातों - रात ,  राज   ऐसा      आयेगा;
 जिसमें  केवल पूँजीवाद    पनप       पायेगा.
 कहें 'क्रान्त' फिररोज पिसेगी जनता इसमें;
 बिस्मिल जी यह   बात लिख  गये  27   में.

 साँप - नेवला - मोर हैं , एक  साथ    एकत्र;
 लोकतन्त्र को कर रहे,मिलकर ये अपवित्र.
 मिलकर ये अपवित्र, रातको मिलकर खाते;
 दिन  में   हमको हाथी   जैसे   दाँत     दिखाते.
 कहें 'क्रान्त' कब टूटेगी यह स्वर्ण - श्रंखला;
 और डसेंगे कब तक हमको साँप - नेवला?

2 comments:

rama said...

loktantra ka chirharan bht acha hai kranti ji . mjhe lgta hai sabhi desh premiyo ko yeh behad pasand ayega. kranti ji aap bht acha kam kr rahe hai.apko bht bht bhadhai . apke liye 2 panktiya.
"e rah rave hayat tjhe yeh khabar nahi ,
tanha bashar bhi apne mein ek karvan hi hai."

ana said...

krant ji prahar asardar hai .....sochne par majboor kar dti hai ....shubhakamnaye