Tuesday, July 23, 2013

Ram Prasad Bismil & his time

काकोरी काण्ड के समय बिस्मिल

रामप्रसाद 'बिस्मिल' और उनका युग
 
बीसवीं सदी के तीसरे दशक में सशस्त्र क्रान्ति के जो प्रयास हुए उन्होंने हिन्दुस्तान के स्वतन्त्रता आन्दोलन में निर्णायक भूमिका निभायी। काँग्रेस का नरम दल क्रान्तिकारियों पर लगातार यह आरोप लगाता रहा कि उनके पास न तो कोई कार्यक्रम है और न ही कोई योजना। वे लोग अपनी आतंकवादी गतिविधियों से एम०के०गान्धी के अहिंसात्मक आन्दोलन को पीछे धकेल रहे हैं।

इसका मुँहतोड़ जबाव देने के लिये सन् उन्नीस सौ चौबीस में बंगाल की क्रान्तिकारी पार्टी के कुछ अनुभवी लोगों ने संयुक्त प्रान्त उत्तर प्रदेश के मैनपुरी काण्ड में फरार क्रान्तिकारी रामप्रसाद 'बिस्मिल' से शाहजहाँपुर आकर सम्पर्क किया। बिस्मिल ने बंगाल के क्रान्तिकारियों से उनके दल की नियमावली आदि प्राप्त की और विदेश से लाला हरदयाल के दिशानिर्देशानुसार कुछ वरिष्ठ क्रान्तिकारियों से परामर्श करके 'हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ' का केन्द्रीय संविधान तैयार किया। पहली जनवरी उन्नीस सौ पच्चीस को इसका 'घोषणा पत्र' अंग्रेजी में बनाकर एक साथ पूरे हिन्दुस्तान के छप्पन जिलों में भिजवा दिया। घोषणा पत्र अंग्रेजी में था अत: उसे पढ़ते ही अंग्रेज सरकार सतर्क हो गयी और उसने बंगाल में धरपकड़ शुरू कर दी। दल के मुख्य नेताओं में शचीन्द्रनाथ सान्याल और योगेश चन्द्र चटर्जी गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिये गये।

अब बिस्मिल के कन्धों पर पार्टी की सारी जिम्मेदारी आ गयी। उन्होंने अपनी आत्मकथा में इसका वर्णन करते हुए लिखा कि जिन कार्यकर्ताओं को बड़ी-बड़ी उम्मीदें और भरोसा दिलाकर पार्टी में शामिल किया था उन्हें किस मुँह से जबाव दिया जाये? पैसे की जुगाड़ में कुछ धनीमानी व्यक्तियों के यहाँ डकैतियाँ भी डालीं किन्तु उनमें कोई खास सफलता नहीं मिली। इसी उधेड़बुन में वे एक दिन फेल्ट हैट लगाकर सहारनपुर से लखनऊ जाने वाली गाड़ी में सफ़र कर रहे थे तभी उन्हें ट्रेन में रेलवे की आमदनी वाले थैले डालने और लखनऊ में उस तिजोरी को उतार लेने की जानकारी मिली। यह सोचकर कि इस तिजोरी में काफी पैसा होगा उन्होंने शाहजहाँपुर में अपने ही घर पर 'हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ' की एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई और ट्रेन लूटने का निश्चय किया।

आठ हजार रुपये से भी कम राशि की इस ट्रेन डकैती के आरोप में सारे क्रान्तिकारियों को साजिशपूर्वक फँसाने, उन पर मुकदमा चलाने और उन सबको कड़ी से कड़ी सजा दिलाने में ब्रिटिश सरकार ने उस जमाने में दस लाख रुपया खर्च किया था जब केवल बीस रुपये में पूरा एक तोला यानी बारह ग्राम सोना मिल जाया करता था।

उन्नीस सौ सोलह की लखनऊ काँग्रेस के स्वागताध्यक्ष पं० जगतनारायण मुल्ला को सरकारी वकील नियुक्त किया गया और उन्हें दो लाख रुपये फ़ीस दी गयी। यह तथ्य स्वयं इस बात की गवाही देते हैं कि इतने सारे होनहार नौजवानों को नीचा दिखाने के लिये काँग्रेस पार्टी और उसकी जन्मदात्री ब्रिटिश सरकार ने योजनापूर्वक इतनी बड़ी साजिश रची थी ताकि जिन्हें वे हिन्दुस्तान का वारिस बनाना चाह रहे थे उनका रास्ता साफ़ हो सके। 'सरफ़रोशी की तमन्ना' को लेकर जीने और मरने वालों ने जो मिसाल कायम की उसके नतीजे सारी दुनिया को पता हैं। बहरहाल 'काकोरी षड्यन्त्र' की घटना इतिहास के पन्नों में अमर हो गयी।

   

3 comments:

KRANT M.L.Verma said...

रामप्रसाद 'बिस्मिल' वैसे तो प्राय: धोती कुर्ता ही पहनते थे लेकिन पुलिस की आँखों में धूल झोंकने के वे भेस बदलने में भी माहिर थे. कभी वे पुलिस की वर्दी में होते थे तो कभी सूटेड बूटेड साहब बन जाते थे. फेल्ट हैट लगाकर वे प्राय: 'एक्शन' (डकैती का कोड वर्ड) किया करते थे. बाद में लाहौर केस में भगतसिंह ने भी फेल्ट हैट का प्रयोग किया था जिसके लिये उन्हें अपनी सिक्ख परम्परा को भी छोड़ना पड़ा. यहाँ पर बिस्मिल का चित्र फेल्ट हैट में देने के पीछे भाव ब्लॉग के दर्शकों को सिर्फ़ यह बतलाना ही है कि बिस्मिल इस भेस में कैसे दिखते थे.

chinmaya Kumar Sahu said...

SARFAROSI KI TAMANNA AB HAMARE DIL MAIN HAI, DEKH NA HAI JOR KITNA BAJUA KATIL MAIN HAI

KRANT M.L.Verma said...

My deat Sahu! Not only this he hsd written many more inspiring poems