Tuesday, May 22, 2012

Rhymes of Emergency (Hindi)

आपातकालीन गजलें

(एक)

किस कदर आज लोग डरते हैं
बात चुपचाप घर में करते हैं

क्या पता कौन कब कहाँ धर ले 
रास्तों से भी कम गुजरते हैं

प्रेस पर लग गयी है सेंसरशिप
लोग सच बात को तरसते हैं

हुक्मरानों से मिल नहीं सकते 
अर्दली तक हमें डपटते हैं

ऐसे हालात में वो बेहतर हैं
जी-हजूरी जो खूब करते हैं

(दो)

तुम उजाले की बात करते हो
सारे घर में अभी अँधेरा है

कैद कबसे हैं चाँद औ सूरज
सिर्फ तारोँ का अब बसेरा है

शेष बस रह गयी है खामोशी
इस कदर बेबसी ने घेरा है

आज स्याही से पुत गया यारो
कैसे कह दूँ कि कल सुनहरा है

गूँगी-गूँगी उदास बस्ती में
आदमी मुद्दतों से बहरा है

(तीन)

बेरहम पीली-पीली वर्दी में
अपना कोई नजर नहीं आता

लाठियों का हुजूम होता है 
आदमी ही नजर नहीं आता 

लाल टोपी का खौफ इतना है
कोई भाई नजर नहीं आता 

सबको एस०पी० बना के छोड़ा है
अब सिपाही नजर नहीं आता 

साफ सड़कें सपाट चौराहे
कोई राही नजर नहीं आता 

(चार) 

इस कदर छा गयी है खामोशी
मुल्क को भा गयी है खामोशी

सरफरोशी की बात करते हो
जिस्म को खा गयी है खामोशी

चोट खाकर भी कुछ नहीं बोले
घाव सहला गयी है खामोशी

अब तो अहसास भी नहीं होता
दिल को बहला गयी है खामोशी

चापलूसों की भीड़ में आकर
हमको भी भा गयी है खामोशी

(पाँच)

कुर्सियाँ बरकरार रखने को
भाड़ में झोंक दी है आबादी

इसको बेहतर कहें या हम बदतर
मुल्क पर छा गयी है बरबादी

सारा इंसाफ ताक पर रखकर
वेगुनाहों पे तोहमतें लादी 

या इलाही! जमात लगता है
जुल्म सहने की हो गयी आदी

जाने कब इन्कलाब आयेगा 
जाने फिर कब मिलेगी आजादी

नोट: मैंने ये गजलें आपातकाल के दौरान लिखी थीं। इनका अंग्रेजी अनुवाद करके स्व० लक्ष्मीमल सिंघवी को भेजा था। आज भी लगभग वैसे ही हालात दिखायी दे रहे हैं। यह सरकार कुर्सी बचाने के लिये कुछ भी कर सकती है अत: समय रहते सावधान रहने की आवश्यकता है।




4 comments:

अवधेश पाण्डेय said...

You said right, lekin fark itna hai ki emergency ke time JP, Nana Ji etc jaise neta the. ab apas me ladane vale log hain. Vikalp ke abhav men janta fir se pisegi, yah sach sweekar karna padega.

Awadhesh

Anonymous said...

अवधेश पाण्डेय जी!
आप बिलकुल दुरुस्त फरमा रहे हैं परन्तु एक बात जान लीजिये बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी? अभी तो दामाद को भुगत रहे हैं सारे खानदान को प्रापर्टी डीलर बना रक्खा है, हद हो गयी.
आपका ही एक भाई,
मोहम्मद आजम खान

KRANT M.L.Verma said...

आज़म भाई!
आदाब अर्ज़ के साथ-साथ एक बात और बड़ी ही साफगोई से आपके माध्यम से पूरी मुस्लिम बिरादरी से पूछना चाहता हूँ! क्या इस देश में काँग्रेस ने मुसलमानों को इसलिये बचा के रक्खा था कि वे अल्पसंख्यक के नाम पर अपनी जनसंख्या बढ़ाएँ और फिर वोट बैंक बनकर काँग्रेस को कुर्सी पर बिठाएँ! ज़रा इस बात पर भी शिद्दत से सोचियेगा!नमस्ते!!

KRANT M.L.Verma said...

आज़म भाई!
आदाब अर्ज़ के साथ-साथ एक बात और बड़ी ही साफगोई से आपके माध्यम से पूरी मुस्लिम बिरादरी से पूछना चाहता हूँ! क्या इस देश में काँग्रेस ने मुसलमानों को इसलिये बचा के रक्खा था कि वे अल्पसंख्यक के नाम पर अपनी जनसंख्या बढ़ाएँ और फिर वोट बैंक बनकर काँग्रेस को कुर्सी पर बिठाएँ! ज़रा इस बात पर भी शिद्दत से सोचियेगा!नमस्ते!!